Aug
25
2010
फलक पे झूम रही सांवली घटाएं हैं
लगी चमकने हृदय में भी क्षण प्रभाएं हैं
वो मुझ से मिलने था आया मगर ना मिल पाया
उसी के गम में उदासी भरी दिशाएं हैं
वो पास था ना जाना उसे, मगर अब वो
चला गया तो लहू रो रही वफाएं हैं
हैं बेवफाई के चर्चे तो उसके हर सूं अब
बुझे चिराग़ हैं, रोती हुई हवाएं हैं
वतन को छोड़ के बेटा हुआ है परदेशी
उदास मां है मगर लब पे बस दुआएं हैं
नसीब में है 'सुधा' पान कब यहाँ सब के
गरल को पी के भी जीने की बस सजाएँ हैं
Aug
01
2010
मित्रो,
नए तेवर और नए कलेवर के साथ..
''हिन्दी चेतना'' में इस बार .....
- कहानियाँ--
राम जाने (पंकज सुबीर),
टेलीफोन लाइन (तेजेंद्र शर्मा),
पगड़ी (सुमन घई)
- संस्मरण--
रिश्ता (सुधा गुप्ता),
दृश्य पटकथा पात्र (शशि पाधा)
- हिन्दी ब्लाग में इन दिनों--
आत्माराम शर्मा
- व्यंग्य--
प्रेम जन्मेजय , समीर लाल समीर
- कविताएँ--
सुदर्शन प्रियदर्शनी, दिविक रमेश, इला प्रसाद, धनञ्जय कुमार,
वेदप्रकाश बटुक, प्रेम मलिक, अदिति मजूमदार, बी मरियम, डॉ. गुलाम मुर्तज़ा
- अमेरिका, कैनेडा , यू.के , भारत से कई लेख, ललित निबंध, लघुकथाएं, साहित्यिक समाचार..
- और भी बहुत कुछ - रोचक और पठनीय...
हिन्दी चेतना को आप पढ़ सकते हैं--
http://hindi-chetna.blogspot.com/
या
http://www.vibhom.com/publication.html
Jan
07
2010
ईश्वर से साक्षात्कार
सम्पादक का आदेश मिला --
''ईश्वर से साक्षात्कार करो,
पहले पन्ने पर छपवाओ,
अखबार की सर्कुलेशन बढ़वाओ.''
लगा, काम तो बहुत आसान है,
किसी गुरु के यहाँ जाते हैं,
भगवान से मिलते हैं,
और इंटरव्यू छाप देते हैं .
गुरु के द्वार पहुँची,
चेलों ने मुलाकात करवाई,
गुरु ने ऊँची-नीची भवें बढ़ाईं,
काफी देर मौन रह वे बोले-
''तू पत्रकार है, तेज़ तर्रार है,
लेखनी से मालामाल है,
समझदार है, पर बेकार है.''
जानती हो क्यों ?
गुरु सेवा के लिए,
तन, मन, धन चाहिए-दे सकोगी?
अन्धविश्वासी-बन सकोगी ?
गुरु की वाणी ही सत्य है- कह सकोगी ?
गुरु के अन्दर ही भगवान है -मान सकोगी ?
तभी तुम भगवान से मिल सकोगी....
लगा काम आसान नहीं,
गुरु का द्वार छोड़, मन्दिर का द्वार पकड़ा,
जोतें जलाईं, घंटियाँ बजाईं,
व्रत उपवास रख, वेद पुराण पकड़ा.
अन्धविश्वासी, रुढ़िवादी बनी,
पर भगवान पकड़ ना पाई.
मन्दिर छोड़,
माँ के घर लौटी-
माँ ने कहा-
'' बेटी, भगवन तो तेरे अन्दर है,
स्वयं को पहचान, तू इसे पा लेगी.''
स्वयं संचेतना में लग गई,
भीतर कहीं रावण की कुटिलता,
दुर्योधन की दुष्टता,
कृष्ण का दर्शन, राम की मर्यादा पाई.
पुराणों का ज्ञान, वेदों का सार,
सब ऋचायें कोशिकाओं में पाईं.
कौरवों-पांडवों का युद्ध- मेरी भावनाएँ हैं,
कृष्ण-अर्जुन संवाद-मेरे तर्क वितर्क हैं,
भगवन शक्ति है, विश्वास है-जो मेरे भीतर है.....
आलेख ले, सम्पादक के पास गई,
उन्हें बात पसन्द नहीं आई.
नौकरी से हटा, महीने की पगार पकड़ा, बोले--
कट्टर पंथियों से टक्कर लेना चाहती हो--
ईश्वर से साक्षात्कार के मार्ग,
तू बंद कर आई है--
उसने तुझे बनाया, तूने उसे पाया, यह भ्रम है.
उस तक जाने के रास्ते हैं...
एक रास्ता पकड़ नहीं तो भटक जाएगी...
तेरा कल्याण नहीं होगा....
आज खड़ी हूँ ...
ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में......
Oct
23
2009
मेरी दो नई कविताएँ पढ़ें--लिंक है ---
http://aakhar.org/
Jun
18
2009
ख़याल
तेरे ख़यालों से
यह महसूस होता रहा
जैसे
व्यक्तित्व मेरा
भीतर से कुछ खोता रहा.
समय की धूल को
जब झाड़ा तो,
दर्द की
ऐसी टीस उठी
और
एक आँसू
भोर तक आँख धोता रहा.
न ढलका,
न लुढ़का,
मगर जाने क्यों
दिल इन मोतियों की
माला पिरोता रहा.
तेरे ख़यालों से
यह महसूस होता रहा
जैसे
व्यक्तित्व मेरा
भीतर से कुछ खोता रहा.
उपवन खिल उठा
जब बहार आई,
बाग़वान बस
मेरे लिए कांटे
बोता रहा.
घायल रूह
और
छलनी जिस्म लिए
उम्र भर अस्तित्व,
घुट-घुट कर रोता रहा.
सुधा ओम ढींगरा
Jun
18
2009
क्या हुआ?
रौशनी की धरती पर
चलते हुए
अंधेरों से
पिघलने लगी
और
दर्द की बस्तियों
से दोस्ती कर
आँचल कागज़ के फूलों
से भरने लगी.
नफरत भरे दिलों
के अंगारों की
जलन से
बचने लगी
और
वर्षों से भरे
दिल के छालों को
न छेड़ दे कोई,
उन्हें
संजोने लगी.
समय के
थपेड़ों ने
सर
झुका दिया
और
लोगों ने
सोचा कि
प्रार्थना,
उपासना
करने लगी.
सुधा ओम ढींगरा
Apr
03
2009
तुम्हें क्या याद आया--
तुम
अकारण रो पड़े--
हमें तो
टूटा सा दिल
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--
तुम
अकारण रो पड़े--
बारिश में भीगते
शरीरों की भीड़ में
हमें तो
बचपन
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया---
तुम
अकारण रो पड़े--
दोपहर देख
ढलती उम्र की
दहलीज़ पर
हमें तो
यौवन
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--
तुम
अकारण रो पड़े--
उदास समंदर किनारे
सूनी आँखों से
हमें तो
अधूरा सा
धरौंदा
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--
तुम
अकारण रो पड़े--
धुँधली आँखों से
सुलघती लकड़ियाँ देख
हमें तो
कोई
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--
सुधा ओम ढींगरा
Mar
21
2009
मुझे पाकिस्तान की मुख्तारां माई से ( जिनका गैंग रेप हुआ था )मिलने का अवसर मिला, अपने स्तम्भ के लिए उनका इंटरव्यू लिया था. उनसे बातचीत कर यह महसूस हुआ कि इस त्रासदी को उन्होंने अपनी कमज़ोरी नहीं ताकत बना लिया है. अपराधियों के विरुद्ध वे लड़ीं और केस जीतीं . अब अपने इलाके में उन्होंने लड़कियों का स्कूल खोला है जहाँ लड़कियां पढ़तीं हैं . बलात्कृत महिलाओं को मुख्तारां माई सहारा देतीं हैं , उनके केस लड़तीं हैं व उन्हें कमज़ोर नहीं होने देतीं . एक लड़की के साथ तो माँ- बाप की मर्ज़ी से रिश्तेज़ाद भाईओं ने रेप किया. रिपोर्ट की तो जिस शर्मिंदगी से उसे गुज़रना पड़ा किस्से ऐसे थे कि रौंगटे खड़े हो गए. सगे रिश्तों ने लूटा, पीटा और ज़लील कर घर से निकाल दिया. दैनिक जागरण में भी एक ख़बर पढ़ी कि माँ की मौत के बाद दो बहनों का पिता और चाचा ने बलात्कार किया. इन सभी से प्रेरित जो रचना उत्पन्न हुई वह प्रस्तुत है---
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
जब पूछा उनसे
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
रिश्ते तो
भले
चंगे
सुख देने वाले होतें हैं .
भराए गले
गालों तक
लुढ़क आए
आंसुओं को समेटते वें बोलीं--
रिश्तों ने
समाज सम्मुख
बलात्कार कर
नंगे बदन
गाँव में घुमाया था.
माँ ने टांगे पकड़
बच्चा गिरवाया था
दूसरे कबीले
के लड़के से प्यार कर
ब्याह जो बनाया था.
मिलीभगत थी
पुलिस की भी
डराया था
धमकाया था
माँ बाप को तंग करेंगें
षड्यंत्र रचाया था
अपराधियों के खिलाफ
रपट वापिस लेने का
दबाब डलवाया था.
डटी रहीं थीं वें
रिश्तों से मुंह मोड़
समाज और इसके
ठेकेदारों से लड़
स्वाभिमान बचाया था.
औरतों के
अधिकारों का तमाशा बना
पुरूष
उसे अपने
उस साम्राज्य में
ले जाना है चाहता
जो सदियों के प्रयत्नों से
औरत को कमज़ोर बना
उसने बनाया था.
परिवार से दुत्कारी
रिश्तों से नक्कारी
पीड़ित , प्रताड़ित
ये वीरांगनाएँ
एक दूजे का साथ देतीं
न्याय को पुकारतीं
अधिकारों को गुहारतीं
बार -बार बदन ढकतीं
जो पुरुषों के
अनर्गल ,
बेवजह प्रश्नों से
उधड़-उधड़ जाता है.
सिर पर आँचल ओढ़ती
सब की सब कह उठीं --
क्या अब भी पूछना है
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
सुधा ओम ढींगरा
Mar
14
2009
मिलन
शोख रंगों में
नये -खिले फूलों ने
धरती को फुलकारी ओढ़ा
फूलों की रंगोली बना
बसंत उत्सव के
स्वागत की
तैयारी कर ली.
ऋतुराज ने भी
मुस्करा कर
बसंत ऋतु को
बांहों में भर लिया
पूरे बरस की विरह
के बाद
मिलन था ना .
सुधा ओम ढींगरा
Dec
16
2008
रूह
आतंकवादी हमला हो
या जातिवाद की लड़ाई
रूह
वापिस देश अपने
भाग है जाती.
हिस्सा बन उसका
हर पीड़ा
हर दर्द
हर चोट है खाती
वेदना से है कराहती .
और हर बार
ज़ख्मी
लुटी-पिटी
प्रताड़ित
परदेस लौट है आती .
रूह अड़िअल है
कहा नहीं मानती
डट है जाती
दाग देती है
कई प्रश्न नेताओं को.
हर बार
दुत्कारी है जाती
परदेसी हो-
परदेस में रहो
''देश के कामों में टांग न अड़ाओ''
देश हो या परदेस
ढीठ रूह भी
नेताओं को पकड़ने से-
बाज़ नहीं आती
उन्हें प्रश्न पूछती ही रहती है.
और हर बार
उसके प्रश्न
नेताओं के सामने परोसे-
मुर्गों के नीचे दब हैं जातें
शराब के प्यालों में बह हैं जातें.
नेता भी जानतें हैं
रूह ज़्यादा दिन
चिल्ला नहीं पाएगी
दो वक्त की रोटी, बच्चों की पढ़ाई
बाप की बीमारी, माँ की तिमारी में खो जायेगी.
उलझे प्रश्नों औ'
आतंकवाद के डर तले
रूह
फिर तड़पती
बिलखती रह जाए गी.
सुधा ओम ढींगरा