Jul 01 2014

‘हिन्‍दी चेतना’ का जुलाई-सितम्‍बर 2014 अंक

मित्रो
संरक्षक एवं प्रमुख सम्‍पादक श्‍याम त्रिपाठी , तथा सम्‍पादक डॉ. सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra के सम्‍पादन में कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्‍दी चेतना' का जुलाई-सितम्‍बर 2014 अंक अब उपलब्‍ध है; जिसमें हैं डॉ मारिया नेज्‍येशी का साक्षात्कार, रीता कश्‍यप , रजनी गुप्‍त Rajni Gupt, आस्‍था नवल Astha Naval , नीरा त्‍यागी Neera Tyagi की कहानियाँ, कहानी भीतर कहानी- सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth , विश्व के आँचल से- साधना अग्रवाल Sadhna Agrawal , पहलौठी किरण में शैली गिल की पहली कहानी, शशि पाधा Shashi Padha का संस्‍मरण, सौरभ पाण्‍डेय Saurabh Pandey की ग़ज़लें, शशि पुरवार Shashi Purwar, रश्मि प्रभा Rashmi Prabha , सरस दरबारी Saras Darbari, रचना श्रीवास्‍तव Rachana Srivastavana , ज्‍योत्‍स्‍ना प्रदीप, सविता अग्रवाल सवि की कविताओं के अतिरिक्त सतीश राज पुष्‍करणा , उर्मिला अग्रवाल, हरकीरत हीर Harkirat Heer के हाइकु, कमलानाथ का व्यंग्य, बालकृष्‍ण गुप्‍ता गुरू, मनोज सेवलकर , मधुदीप तथा डॉ पूरन सिंह की लघुकथाएँ, । भाषांतर अमृत मेहता, ओरियानी के नीचे रेनु यादव, साथ में पुस्तक समीक्षा- देवी नागरानी (डॉ. कमलकिशोर गोयनका की प्रेमचंद पर पुस्‍तक) , रघुवीर ( सन्‍तोष श्रीवास्‍तव का यात्रा संस्‍मरणऋ Santosh Srivastava, सुधा गुप्‍ता, पंकज सुबीर ( गीताश्री का कहानी संग्रह) Geetashree , दृष्टिकोण- सिराजोदीन, नव अंकुर- अदिति मजूमदार , साहित्यिक समाचार, चित्र काव्यशाला, विलोम चित्र काव्यशाला, अविस्‍मरणीय, आख़िरी पन्ना और भी बहुत कुछ। यह अंक अब ऑनलाइन उपलब्‍ध है, पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जाएँ ।
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Apr 08 2014

त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्‍दी चेतना’ का अप्रैल-जून 2014 अंक अब उपलब्‍ध है

मित्रो
नव संवत्‍सर की शुभकामनाएँ!!!
संरक्षक एवं प्रमुख सम्‍पादक श्‍याम त्रिपाठी , तथा सम्‍पादक डॉ. सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra के सम्‍पादन में कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्‍दी चेतना' का अप्रैल-जून 2014 अंक अब उपलब्‍ध है; जिसमें हैं डॉ कविता वाचक्‍नवी DrKavita Vachaknavee का साक्षात्कार, मनमोहन गुप्ता मोनी Manmohan Gupta Moni , प्रतिभा सक्सेना , जय वर्मा Jai Verma , ब्रजेश राजपूत Brajesh Rajput, प्रो.शाहिदा शाहीन की कहानियाँ, कहानी भीतर कहानी- सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth , पहलोटी किरण में रीनू पुरोहित की पहली कहानी, शशि पाधा Shashi Padha के नवगीत, अनीता शर्मा , भूमिका द्विवेदी Bhumika Dwivedi , दीपक मशाल Dipak Mashal , पुष्पिता अवस्थी , विकेश निझावन Vikesh Nijhawan की कविताओं के अतिरिक्त हाइकु, प्रेम जनमेजय प्रेम जनमेजय , कुमारेन्द्र किशोरी महेन्द्र के व्यंग्य Raja Kumarendra Singh Sengar , डॉ. सुधा गुप्ता , उपेन्द्र प्रसाद राय , पीयूष द्विवेदी ‘भारत' की लघुकथाएँ अमर नदीम Amar Nadeem की ग़ज़लें, डॉ. विशाला शर्मा Vishala Sharma का आलेख, मीरा गोयल Meera Goyal का संस्मरण, विश्व के आँचल से- साधना अग्रवाल Sadhna Agrawal। साथ में पुस्तक समीक्षा- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ Rameshwar Kamboj Himanshu , रमाकान्त राय , दृष्टिकोण- सुबोध शर्मा , विश्वविद्यालय के प्रांगण से- बेलिंडा विलियम्स, नव अंकुर- गीता घिलोरिआ, साहित्यिक समाचार, चित्र काव्यशाला, विलोम चित्र काव्यशाला, आख़िरी पन्ना और भी बहुत कुछ। यह अंक अब ऑनलाइन उपलब्‍ध है, पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जाएँ ।
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Feb 24 2014

अमेरिका की कविता: काव्य रसों का कोलॉज

अमेरिका की कविता: काव्य रसों का कोलॉज
सुधा ओम ढींगरा


अमेरिका की धरती, हिन्दी और साहित्य के लिए अब बंजर नहीं रही है। हिन्दी के कई साधकों ने अपनी कलम का हल बनाकर इसकी धरती गोड़ी है, सपनों के बीज डाले हैं और ममता की बेलें बोई हैं। कविताओं, कहानियों और उपन्यासों की अच्छी ख़ासी फसल तैयार की है। भिन्न-भिन्न कविताओं के फूल रोज़ खिलते हैं। हिन्दी साहित्य में इनकी खुशबू ज़ोर -शोर से अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है।

जीवन की व्यस्तता में भी अपनी कल्पनाशक्ति की तीव्रता के साथ भावनाओं से जुड़े रहना भी अपने आप में एक कला है। परिवेश के बदलाव के साथ-साथ भीतर का बदलाव और समाज को बदलने के संघर्ष से जूझ रही हैं यहाँ की अधिकतर कविताएँ।


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह ज़ोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है।


यहाँ के कवियों ने भी बस अपनी संवेदनाओं को, भावनाओं को विश्व में व्याप्त किया है।


कवयित्री रेखा मैत्र के दस कविता संग्रह, पलों की परछाइयाँ, मन की गली, उस पार, रिश्तों की पगडंडियाँ, मुट्ठी भर धूप, बेशर्म के फूल, ढाई आखर, मोहब्बत के सिक्के, बेनाम रिश्ते और यादों का इन्द्रधनुष हैं । इनकी कविताओं का मूल स्वर कहीं अद्वैतवाद का दर्शन समेटे है, कहीं रिश्तों की पड़ताल करता प्रतीत होता है, कहीं विदेश की बड़ी -बड़ी अट्टालिकाओं से भरमाया लगता है और कहीं कविता अंतरद्वंद्व से गुज़रने का भाव भर है और तब अपने आपको पहचान पाना भी दुश्वार हो जाता है। आज के समय में अपने अस्तित्व की खोज ही अपने आप में एक अनूठा संघर्ष है। पिचकारी कविता के अंतर्गत पिचकारी का प्रयोग दिल को चीर जाता है …तुम्हारी ढेरों पिचकारियाँ / अब भी वैसी ही पड़ी है / मैं उनसे तुम्हारी / भोजन नली में / तरल भोजन दिया करती/ और तुम कहा करते/ कि इसे सँभालकर रखना/ होली पर इनसे रंग खेलेंगे ! रेखा मैत्र कल्पना की दुनिया से यथार्थ के कठोर धरातल पर ले आती हैं… कहती हैं- ''जब आस -पास का परिवेश मुझे हिला जाता है तो हरसिंगार सी झरती हैं कविताएँ। वेदना, खुशी, प्रवास सब मेरी कविता में घुल मिल जाते हैं। रेखा मैत्र के बिम्ब इनकी अभिव्यक्ति की शक्ति है।



कहानीकार, उपन्यासकार और कवयित्री सुदर्शन प्रियदर्शिनी के चार काव्य संग्रह हैं- शिखंडी युग, बराह, यह युग रावण है, मुझे बुद्ध नहीं बनना। सुदर्शन जी की कविताओं के प्रतीक इनकी पहचान हैं। आलोचक डॉ. कमल किशोर गोयनका इनकी कविताओं के स्वर का यूँ वर्णन करते हैं-''कवयित्री अपनी काव्य सृष्टि में हिन्दू मिथक पात्रों का प्रयोग करती है और कविताओं को अर्थवान बनाती है। यह एक प्रवासी मन का सांस्कृतिक बोध है; जो कई कविताओं में दिखाई देता है।'' सुदर्शन प्रियदर्शिनी अपने काव्य लेखन के बारे में कहती हैं-''कमोवेश हर जीवन में विसंगतियाँ अपना डेरा डालती हैं। कोई हरता है और कोई उन्हें जीवन की चुनौतियाँ मान कर डटा रहता है। मैंने चुनौतियों के समक्ष घुटने न टेक कर उन्हें स्वीकारा है और जूझने की कोशिश की है। टूट-फूट बहुत होती है-अपनी भी और आत्मा की भी-फिर भी मुँह नहीं मोड़ा है। ऐसे में मेरी कविता हाथ-पकड़ कर, उन घावों को सहला देती है। कहीं ममता जैसा साया बन कर बचा लेती हैं तो कहीं मित्र बन कर कन्धा देतीं हैं। कविता उन तूफ़ानों से बचाती है जो ऊपर से नहीं अंदर से गुज़रते हैं।'' इनकी कविताएँ पाठकों को संवेगों के उच्छवास में जकड़ लेती हैं। कुंती द्वार पर आई / दस्तक भिजवाई / कोई आवाज़ नहीं आई / सूरज बेगाना हो गया…. रोज़ सिसकती है कुंती/ रोज़ मंदोदरी का क्रंदन/ नया कुछ भी नहीं/ बस सीता का फिर हरण हो गया…। सुदर्शन जी के प्रतीक बाँध लेते हैं।



कहानीकार, कवयित्री अनिल प्रभा कुमार का कविता संग्रह तो हाल ही में आया है-उजाले की कसम। अनिल जी की कविताएँ दिल को छूती हैं तथा साथ ही क्रांति का बिगुल बजाती भी महसूस होती हैं। अजित कुमार लिखते है -''उस कारण को टोहने-टटोलने के क्रम में नारी-जीवन की ऐसी अनेक मार्मिक छवियों से मैं परिचित हुआ, जिनकी मात्र किताबी जानकारी ही अब तक हो सकी थी। यह कि शैशव से लेकर वार्धक्य तक ‘फ़ेयर सेक्स’ को रिझाने-लुभाने,दबने-सहमने शंकित-पीड़ित रहने के लंबे सिलसिलों से गुज़रने का‘अनफ़ेयर दबाव’ झेलना पड़ता है, और अपनी स्वाभाविक ममता-कोमलता  बचाये रखने की जद्दोजेहद उसे टूट-टूट कर भी अपने आप को जोड़े रखने के कितने सबक सिखाती है… यह समूची कहानी कविताओं में सीधे-सरल-सच्चे ढंग से पिरो दी गई है।'' अनिल प्रभा कुमार की भाषा सरल ज़रूर है पर विसंगतियों और विद्रूपताओं पर कटाक्ष करती, स्त्री विमर्श के तीखे तेवर समेटे हैं। इनकी कहनियों से अधिक कविताएँ स्त्री की पक्षधर हैं। माँओं, गान्धारियों, नारियो/ खोल दो / आँखों पर बँधी इस पट्टी को। झुलसा दो/ उन घिनौने हाथों को/ जो बढ़ रहे हैं / नोचने तुम्हारे अंश को।


कहानीकार, कवयित्री, पत्रकार, सुधा ओम ढींगरा के धूप से रूठी चाँदनी, तलाश पहचान की, सफ़र यादों का, तीन काव्य संग्रह हैं। डॉ.आज़म लिखते हैं-''इनकी कविताओं में शब्दों के जब झरने बहते हैं, तो छंद मुक्त कविता में भी एक संगीत और लय का आभास  होने लगता है। रोज़ाना के हँसने-हँसाने वाली रोने -रूलाने वाली स्थितियों को जहाँ शब्दों का पहनावा दिया गया है, वहीं ठोस फ़िलासफ़ी पर आधारित रचनाएँ भी हैं,  जिनको कई बार पढ़ने को जी चाहता है । लेखनी में इतनी सादगी है कि हम इसके जादू के प्रभाव में आ जाते  हैं। विदेशों में रहने  वालों का सृजन महज शुगल है, महज शौक है, जिस में साहित्य नदारद रहता है, इस तरह के पूर्वाग्रहों के जालों को दिमाग़ से साफ करने की क्षमता है सुधा जी की रचनात्मकता में।'' डॉ. आज़म समग्र काव्य पर लिखते हुए कहते हैं-''सुधा ओम ढींगरा की कविताओं में विविधता है, रोचकता है, जीवन के हर शेड मौजूद  हैं। जमाने का हर बेढंगापन निहित है । पुरुषों का दंभ उजागर है, महिला का साहस दृष्टिगोचर है। दुनिया भर में घटित होने वाली मार्मिक घटनाओं पर भी पैनी नज़र रखी हुई है, कई कविताएँ दूसरे देशों में  घटित घटनाओं से उद्वेलित होकर लिखी हैं । जैसे ईराक युद्ध में नौजवानों के शहीद होने पर लिखी कविता हो  या पकिस्तान की बहुचर्चित मुख्तारन माई को समर्पित कविता, इस सत्य को उजागर करता है कि सहित्यकार वही है जो वैश्विक हालात पर न सिर्फ दृष्टि रखे, बल्कि उद्वेलित होने पर कविता के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर सके । इस तरह सुधा ओम ढींगरा स्त्री विमर्श के साथ एक ग्लोबल अपील रखने वाली कवयित्री हैं।''

कविता जिनकी साँसें हैं और काव्य की हर विधा में लिखने वाली अनिता कपूर के बिखरे मोती, कादम्बरी, अछूते स्वर, ओस में भीगते सपने एवं साँसों के हस्ताक्षर, काव्य-संग्रह हैं और दर्पण के सवाल, हाइकु-संग्रह है। रामेश्वर काम्बोज 'हिमाँशु' लिखते हैं-''अनिता कपूर जी की कविताएँ मुक्त छंद में होते हुए भी अपनी त्वरा और गहन संवेदना के कारण सबसे अलग नज़र आती हैं। इनकी कविताओं में प्यार और समर्पण केवल भावावेश के क्षण बनने से इंकार करते हैं, सच्ची आत्मीयता की तलाश जारी है, लेकिन केवल अपनी शर्तों पर।'' सहजता और सरलता लिए छोटी-छोटी कविताएँ हृदय में रमती जाती हैं। अनूठे बिम्बों ने कविताओं को एक अलग अस्तित्व, पहचान और स्वरूप दिया है। हम ओढ़नी के फटे हुए / टुकड़ों की तरह मिले, कोख के बही खातों में एक आग सी लग जाती है , चाँदनी के घुंघरु बाँधे/ इठलाती रक्क्सा सी हवाएँ आदि। जग का दर्द और कवयित्री की पीड़ा आत्मसात होकर कसक, तड़प, अनुनय, विनय, प्यार में बदल गए जो कविताओं में बिखरा पड़ा हैकिसी भी रस की अभिव्यक्ति में नारी के आत्मसम्मान और स्वाभिमान का साथ नहीं छूटा। बिम्बों का तीखापन कवयित्री के कटु अनुभवों की छवि देता महसूस होता है

Wordsworth defined poetry as "the spontaneous overflow of powerful feelings." वर्ड्सवर्थ की ये पंक्तियाँ आशु कवि व गीतकार राकेश खंडेलवाल पर सटीक बैठती हैं। अंतर्जाल पर उन्हें गीतों का राजा कहा जाता है और वैराग से अनुराग तक, अमावस का चाँद, अँधेरी रात का सूरज, कविता संग्रह हैं तथा धूप गंध चांदनी, सम्मिलित कविता संग्रह हैछंद जिनकी कलम पर चुपके से आ बैठते हैं और सहजता से कागज़ों पर उतरते जाते हैं । ईकविता समूह की त्रिमूर्ति में से एक हैं आप। कवि-सम्मेलनों में गीतों के बादशाह कहलाए जाने वाले कवि राकेश खंडेलवाल जी कहते हैं-''भाव और विचार अपने लिये शब्द और रास्ता स्वयं ही तलाश लेते हैं, परन्तु मेरे सामने प्रारंभ से ही यही समस्या रही कि भाव जब भी मन में उठते हैं वह स्वत: एक लय में बँधे हुए उठते हैं । कब किस धुन में वे स्वयं ढल जाते हैं इस पर मेरा अपना नियंत्रण नहीं।'' राकेश जी की उपमाओं का अंदाज़ निराला है।


छोटी-छोटी कविताएँ, नज़्में लिखने वाले अनूप भार्गव, ईकविता समूह के संचालक हैं और लिखते हैं- ''न तो साहित्य का बड़ा ज्ञाता हूँ/ न ही कविता की /भाषा को जानता हूँ/ लेकिन फ़िर भी मैं कवि हूँ/ क्योंकि ज़िन्दगी के चन्द/ भोगे हुए तथ्यों/ और सुखद अनुभूतियों को/ बिना तोड़े मरोड़े/ ज्यों की त्यों/ कह देना भर जानता हूँ।'' यथार्थ और सत्य को बुनती, घड़ती इनकी कविताएँ सामाजिक परिवर्तन की बात भी कहती हैं और दर्शन से भीगे शब्द हृदय को छूते, बुद्धि को झकझोरते हैं। कवि सम्मेलनों में कविता कहने के निराले अंदाज़ के कारण ख़ासे प्रसिद्ध हैं और चेतना जगाती कविताओं के अंदाज़ भी निराले हैं।


प्रतिभा सक्सेना का उत्तर कथा- खंड काव्य है। लोक रंग के गीतों, काँवरिया, नचारियाँ के लिए प्रतिभा जी बहुत प्रसिद्ध हैं। आदिकालीन कवि विद्यापति के बाद हिन्दी साहित्य में नचारियाँ नहीं दिखाई देतीं है और आपने इस तरफ़ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। इनकी कविताओं की परिष्कृत भाषा है, जो आज के युग में कम ही कविताओं में देखने को मिलती है। कविताओं में हर रस का स्वर और स्वाद मिलता है और छायावादी युग का आनन्द भी। नचारियाँ का उदहारण देखें-वाह, वासुदेव, सब लै के जो भाजि गये,/ कहाँ तुम्हे खोजि के वसूल करि पायेंगे! /एक तो उइसेई हमार नाहीं कुच्छौ बस, /तुम्हरी सुनै तो बिल्कुलै ही लुट जायेंगे!


छायावादी युग में ही ले जाती हैं शशि पाधा की कविताएँ। पहली किरण, मानस मंथन, अनंत की ओर तीन कविता संग्रह हैं कवयित्री शशि जी के और कविता, गीत, नवगीत, दोहा, हाइकु यानी काव्य की हर विधा में आप लिखती हैं। महादेवी की परछाईं लगती हैं आप की कविताएँ। शशि जी कहती हैं-''मेरी रचनाओं का मूल स्वर है "प्रेम"। यह प्रेम चाहे माँ का अपनी संतान के प्रति हो, पति- पत्नी का हो, बच्चों का माता-पिता के प्रति हो या मित्रों का परस्पर स्नेह हो। मैं प्रेम को केवल दैहिक, लौकिक प्रेम नहीं मानती बल्कि हर रिश्ते में, हर परिस्थिति में प्रकृति के लघुतम कण में भी  जो लगाव / जुड़ाव होता है मैं उस प्रेम की बात कर रही हूँ। मुझे प्रकृति के प्रत्येक क्रिया कलाप में प्रेम की झलक दिखाई देती है। ना जाने कितने रूपों में प्रकृति हमें प्रेम के सुन्दर, सात्विक और कल्याणकारी रूप से परिचित कराती है। प्रेम मेरे जीवन दर्शन का बीज मंत्र है।'' शशि पाधा की कविताएँ प्रेम के कई सोपान पार कर गूढ़ रहस्य खोलती जाती हैं।


शकुंतला बहादुर की सशक्त भाषा और प्रगाढ़ शब्दों से कविता कहती हैं। प्रहेलिकाएँ बहुत सुंदर लिखतीं हैं। उपमाओं के साथ इनका नॉसटेल्जिया भी एक कहानी कहता है। हर रंग में अपनी बात कहतीं हैं। कई कविताओं में रहस्यवाद की झलक भी मिलती है। एक प्रहेलिका का आनन्द लें- नर-नारी के योग से, सदा जन्म पाती / पैदा होते ही तो मैं, संगीत सुनाती / पल भर का जीवन मेरा/ मैं तुरत लुप्त हो जाती / जब जब मुझे बुलाए कोई/ मैं फिर फिर आ जाती। (चुटकी-अँगूठा और उँगली का योग)

Emily Dickinson said, "If I read a book and it makes my body so cold no fire ever can warm me, I know that is poetry.'' युवा कवयित्री रचना श्रीवास्तव की कविताएँ ऐसा ही आभास देती हैं, क्षणिकाएँ, हाइकु, नवगीत, सेदोका, तांका, चोका सीधी सरल भाषा में पाठकों के मन को झकझोर जाते हैं। बिम्ब, उपमाएँ और अनूठे प्रतीक प्रयोग करके अपनी बात कहती हैं। मन के द्वार हज़ार, अवधी में हाइकु संग्रह है रचना का। क्षणिका के झलक देखें - बच्ची के मुट्ठी में / माँ का आँचल देख / अपनी हथेली सदैव / ख़ाली लगी।

प्रेम पर लिखने वाली उभर रही युवा कवयित्री शैफाली गुप्ता कहीं महाभारत के अभिमन्यु के साथ तुलना कर विरह की आग में जलते हुए भी अपने प्रेमरूपी चक्रव्यूह में जकड़ी जाती है और कहीं आस्तित्व की तलाश में न जाने जीवन के कितने बहतरीन पल खो देती है। शैफाली गुप्ता ना केवल हिन्दी कविताओं में दक्ष है, अंग्रेज़ी कविताएँ लिखने में भी अभिरुचि रखती हैं।


सशक्त युवा हस्ताक्षर अभिनव शुक्ल, जिनकी कविताएँ मंच, ऑनलाइन और पुस्तकों में धूम मचाती हैं, विशेषतः वे कविताएँ जो प्रवासी स्वर लिए हैं। 'पारले जी' और 'लौट जाएँगे' कविताएँ पाठकों को रुला देती हैं। अभिनव लिखते हैं -अलार्म बज बज कर / सुबह को बुलाने का प्रयत्न कर रहा है / बाहर बर्फ बरस रही है / दो मार्ग हैं / या तो मुँह ढक कर सो जाएँ / या फिर उठें / गूँजें और 'निनाद' हो जाएँ। अमेरिका की पतझड़ पर लिखते हैं -लाल, हरे, पीले, नारंगी, भूरे, काले हैं / पत्र वृक्ष से अब अनुमतियाँ लेने वाले हैं / मधुर सुवासित पवन का झोंका मस्त मलंगा है/ पतझड़ का मौसम भी कितना रंग बिरंगा है। अभिनव अनुभूतियाँ और पत्नी चालीसा आपकी पुस्तकें हैं और हास्य दर्शन-1 एवं 2 आपकी काव्य सीडी हैं।


युवा कवि अमरेन्द्र कुमार कहानीकार, व्यंग्यकार और ग़ज़लकार भी हैं। 'अनुगूँज' कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आपकी कविताएँ दिमाग़ पर ज़ोर डालती हैं और सोचने पर मजबूर करती हैं। प्रकृति के चित्रण की खूबसूरती देखें-रात ने लगाई / एक बड़ी सी  बिंदी / चन्द्रमा की ओर जूडे को सजा लिया / अनगिनत तारों से। जाने से पहले / उसने दिन के माथे पर / सूरज का टीका लगा दिया। यथार्थ से लिपटी एक कविता देखें -छोटे से छोटे / अथवा बड़े से बड़े / पुरस्कारों को देने / के साथ जो वक्तव्य / जारी किया जाता है / उसे सुन-पढ़कर / कई बार लगता है / कि वह सफाई है / अथवा आत्म-ग्लानि / या फिर /एक प्रकार का अपराधबोध।


अमेरिका का बरगद का वृक्ष वेद प्रकाश 'वटुक की, बंधन अपने देश पराया, क़ैदी भाई बंदी देश, आपातशतक, नीलकंठ बन न सका, एक बूँद और, कल्पना के पंख पा कर, लौटना घर के बनवास में, रात का अकेला सफ़र, नए अभिलेख का सूरज, बाँहों में लिपटी दूरियाँ, सहस्त्र बाहू अनुगूंज के अतिरिक्त 23 काव्यसंग्रह और काव्यधारा 133 खंड ( 40 हज़ार कविताएँ ) हैं। आपकी कलम ने विश्व भर में अन्याय और युद्धों के विरुद्ध शब्द उड़ेले हैं।'वटुक' जी ने १९७१ से पूर्व अमेरिका में हो रही असमानता तथा वियतनाम युद्ध के विरोध में किये जा रहे संघर्ष के पक्ष में अपनी व्यथा व्यक्त की है । मानवीय अधिकारों को समर्पित कविताएँ लिखी हैं । भारत के १८ महीने के आपातकाल में अधिनायकवाद के विरोध में अनेक कविताओं का सृजन किया । हिन्दी साहित्यकारों के प्रख्यात शोधार्थी श्री कमल किशोर गोयनका जी के अनुसार प्रवासी भारतीयों में वटुक जी अकेले ही ऐसे हिन्दी कवि हैं, जिन्होंने आपातकाल के विरोध में हज़ारों कविताएँ लिखीं । स्वर्गीय कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' ने इनके 'आपातशतक' की प्रशंसा करते समय लिखा था:"काव्य का ऐसा समापन तो गुरुदेव भी नहीं कर सकते थे।''


अमेरिका की काव्य बगिया का पीपल का पेड़ गुलाब खंडेलवाल के, सौ गुलाब खिले, देश विराना है, पँखुरियाँ गुलाब की के अतिरिक्त पचास से ऊपर काव्यग्रंथ हैं। आपने गीत, दोहा, सॉनेट, रुबाई, ग़ज़ल, नई शैली की कविता और मुक्तक, काव्यनाटक, प्रबंधकाव्य, महाकाव्य, मसनवी आदि के सफल प्रयोग किए हैं; जो पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी द्वारा संपादित गुलाब-ग्रंथावली के पहले, दूसरे, तीसरे, और चौथे खंड में संकलित हैं तथा जिनका परिवर्धित संस्करण आचार्य विश्वनाथ सिंह के द्वारा संपादित होकर वृहत्तर रूप में पुनः प्रकाशित हुआ है।

इनके अतिरिक्त ग़ज़ल विधा में अंनत कौर, धनंजय कुमार, ललित आहलूवालिया, कुसुम सिन्हा, देवी नागरानी ने धड़ल्ले से ग़ज़ल प्रेमियों को अपनी ग़ज़लें सुनाई हैं। इससे पहले कि अमेरिका हड्डियों में बसे अंजना संधीर भारत लौट गईं। सुषम बेदी, गुलशन मधुर, अर्चना पंडा, डॉ. कमलेश कपूर, कल्पना सिंह चिटनिस, किरण सिन्हा, बीना टोढी, मधु महेश्वरी, रजनी भार्गव, राधा गुप्ता, रानी सरिता मेहता, रेणू 'राजवंशी' गुप्ता, लावण्या शाह, विशाखा ठाकर 'अपराजिता', कुसुम टन्डन, इला प्रसाद, नरेन्द्र टन्डन, घनश्याम गुप्ता, हरि बाबू बिंदल और राम बाबू गौतम आदि कई कवि- कवयित्रियाँ हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।


101 Guymon Court, Morrisville, NC--27560 USA
sudhadrishti@gmail.com
Phone-919-678-9056(H), 919-801-0672(Mobile)

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Jan 07 2014

‘हिन्‍दी चेतना’ का जनवरी-मार्च 2014 अंक



मित्रो
नव वर्ष की शुभकामनाएँ!!!
संरक्षक एवं प्रमुख सम्‍पादक श्‍याम त्रिपाठी, तथा सम्‍पादक डॉ. सुधा ओम ढींगरा के सम्‍पादन में कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्‍दी चेतना' का जनवरी-मार्च 2014 अंक अब उपलब्‍ध है; जिसमें हैं सुषम बेदी का साक्षात्कार, पुष्पा सक्सेना, उषादेवी कोल्हटकर, फ़राह सैयद की कहानियाँ, नव क़दम में रचना आभा की पहली कहानी, अनिता ललित, मृदुला प्रधान, संतोष सावन, पंखुरी सिन्हा, शैफाली गुप्ता की कविताएँ, मंजु मिश्रा की क्षणिकाओं के अतिरिक्त हाइकु, ताँका, माहिया, रमेश तैलंग, अखिलेश तिवारी, अशोक मिज़ाज की ग़ज़लें, डॉ. जेन्नी शबनब और रेनू यादव का स्त्री-विमर्श, आलेख, सीमा स्मृति, राजेन्द्र यादव, उर्मि कृष्ण की लघुकथाएँ, ललित शर्मा का संस्मरण, अशोक मिश्र और संजय झाला का व्‍यंग्‍य। साथ में पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक समाचार, चित्र काव्यशाला, विलोम चित्र काव्यशाला, आख़िरी पन्ना और भी बहुत कुछ। यह अंक अब ऑनलाइन उपलब्‍ध है, पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जाएँ ।
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हिन्दी चेतना टीम

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Oct 01 2013

”नई सदी का कथा समय” हिन्‍दी चेतना का अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2013 विशेषांक अब उपलब्‍ध है ।





संरक्षक एवं प्रमुख सम्‍पादक श्‍याम त्रिपाठी, तथा सम्‍पादक डॉ सुधा ओम ढींगरा के सम्‍पादन में


हिन्दी चेतना (हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका)


का विशेषांक अक्‍टूबर-दिसंबर 2013


''नई सदी का कथा समय'' (अतिथि सम्‍पादक - पंकज सुबीर )


नई सदी की हिंदी कहानी पर केन्द्रित।


पिछले 13 वर्षों का प्रतिनिधित्व करने वाली चार कहानियां।


स्त्री लेखन की प्रतिनिधि कहानी (चयन : सुप्रसिद्ध कहानीकार विमल चन्द्र पाण्डेय ।)


पुरुष लेखन की प्रतिनिधि कहानी (चयन : सुप्रसिद्ध कहानीकार मनीषा कुलश्रेष्ठ।)


प्रवासी स्त्री तथा पुरुष लेखन की प्रतिनिधि कहानियाँ (चयन : सुप्रसिद्ध आलोचक साधना अग्रवाल।)


इन चारों कहानियों के माध्यम से अपने समय की पड़ताल करते हुए चार आलेख।


दूसरी परम्‍परा के सम्‍पादक डॉ. सुशील सिद्धार्थ से सुधा ओम ढींगरा का विशेष साक्षात्कार ।


नई सदी के कथा समय पर युवा आलोचक वैभव सिंह का आलेख।


नई सदी के तेरह साल और हिन्दी किस्सागोई युवा कथाकार गौतम राजरिशी का आलेख।


प्रवासी हिन्दी कहानी की नई सदी, वरिष्ठ कथाकार तेजेन्द्र शर्मा तथा अर्चना पैन्यूली के आलेख।


नई सदी में सामने आई प्रवासी कहानी पर साहित्यकारों के बीच गोलमेज परिचर्चा।


कहानीकार विवेक मिश्र के संयोजन में कथाकारों, सम्‍पादकों तथा आलोचकों के बीच परिचर्चा।


''नई सदी की सबसे पसंदीदा दस कहानियाँ'' साहित्‍यकारों की पसंदीदा 10 कहानियां


साथ में सम्‍पादकीय, आखिरी पन्‍ना, साहित्यिक समाचार और भी बहुत कुछ।


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हिन्दी चेतना टीम

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Jun 24 2013

कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्‍दी चेतना’ का जुलाई सितम्‍बर 2013 अंक अब उपलब्‍ध है



आदरणीय मित्रों
श्री श्‍याम त्रिपाठी तथा सुधा ओम ढींगरा के संपादन में कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्‍दी चेतना' का जुलाई सितम्‍बर 2013 अंक अब उपलब्‍ध है, जिसमें हैं सुधा अरोड़ा का अंकित जोशी द्वारा लिया गया विशेष साक्षात्‍कार । अनिल प्रभा कुमार, अफरोज़ ताज तथा बलराम अग्रवाल की कहानियां । वरिष्‍ठ कहानीकार श्री नरेंद्र कोहली की लम्‍बी कहानी। प्रेम जनमेजय, सुकेश साहनी तथा दीपक मशाल की लघुकथाएं। नुसरत मेहदी की ग़ज़लें। भरत तिवारी, अनीता कपूर, प्रतिभा सक्‍सेना तथा चंदन राय की कविताएं। हाइकु,  माहिया, सेदोका, आलेख, संस्‍मरण। साथ में पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक समाचार, चित्र काव्यशाला, विलोम चित्र काव्यशाला और आख़िरी पन्ना । यह अंक अब ऑनलाइन उपलब्‍ध है, पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जाएं ।
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हिन्दी चेतना टीम

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Apr 09 2013

‘हिन्‍दी चेतना’ का अप्रैल जून 2013 अंक अब उपलब्‍ध है



आदरणीय मित्रों
होली तथा नव संवत्‍सर की शुभकामनाएं
श्री श्‍याम त्रिपाठी तथा सुधा ओम ढींगरा के संपादन में कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्‍दी चेतना' का अप्रैल जून 2013 अंक अब उपलब्‍ध है, जिसमें हैं रेखा मैत्र का विशेष साक्षात्‍कार । महेन्‍द्र दवेसर, भावना सक्‍सैना तथा नीरा त्‍यागी की कहानियां । वरिष्‍ठ कहानीकार श्री नरेंद्र कोहली की लम्‍बी कहानी। हाइकु,  कविताएं, ग़ज़लें, आलेख, लघुकथाएं, संस्‍मरण। साथ में पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक समाचार, चित्र काव्यशाला, विलोम चित्र काव्यशाला और आख़िरी पन्ना । यह अंक अब ऑनलाइन उपलब्‍ध है, पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जाएं ।
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सुधा ओम ढींगरा
संपादक -हिन्दी चेतना

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Jan 31 2013

हिमाचल की पत्रिका हिमप्रस्थ में प्रकाशित कविताएँ

हिमाचल की पत्रिका हिमप्रस्थ में प्रकाशित कविताएँ

विचार


आते तो हैं
स्वछंद ,
उन्मुक्त बाला से.
कलम पर बैठते ही
दुल्हन से हो जाते हैं....
शब्दों की ओढ़नी,
शिल्प के आभूषण,
कथ्य की पाजेब पहन
भिन्न -भिन्न स्वरूप धरते हैं
कैसे सुन्दर सजते हैं....

कई रंगों,
कई रूपों
कई विधाओं में
बंध कर इठलाते हैं...

खिलंदड़े
कागज़ों से लिपटे
पुस्तकों में बंद
चुप पड़े रहते हैं....

जैसे इंतज़ार हो किसी का....
कोई आए, उनका घूँघट उठाये...
सच कहूँ

सच कहूँ,
चाँद- तारों की बातें
अब नहीं सुहाती .....

वह दृश्य अदृश्य नहीं हो रहा
उसकी चीखें कानों में गूंजती हैं रहती  |
उसके सामने पति की लाश पड़ी थी,
वह बच्चों को सीने से लगाए
बिलख रही थी ....
पति आत्महत्या कर
बेकारी, मायूसी, निराशा से छूट गया था |

पीछे रह गई थी वह,
आर्थिक मंदी की मार सहने,
घर और कारों की नीलामी देखने |
अकेले ही बच्चों को पालने और
पति की मौत की शर्मिंदगी झेलने |

बार -बार चिल्लाई थी वह,
कायर नहीं थे तुम
फिर क्या हल निकाला,
तंगी और मंदी का तुमने |

आँखों में सपनों का सागर समेटे,
अमेरिका वे आए थे |
सपनों ने ही लूट लिया उन्हें
छोड़ मंझधार में चले गए |

सुख -दुःख में साथ निभाने की
सात फेरे ले कसमें खाई थीं |
सुख में साथ रहा और
दुःख में नैया छोड़ गया वह |
कई भत्ते देकर
अमरीकी सरकार
पार उतार देगी नौका उनकी |

पर पीड़ा,
वेदना
तन्हाई
दर्द
उसे अकेले ही सहना है

सच कहूँ,
प्रकृति की बातें
फूलों की खुशबू अब नहीं भरमाती......

तुम्हें क्या याद आया---

तुम अकारण रो पड़े--
हमें तो
टूटा सा दिल
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

तुम अकारण रो पड़े--
बारिश में भीगते
शरीरों की भीड़ में
हमें तो
बचपन
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया---

तुम अकारण रो पड़े--
दोपहर देख
ढलती उम्र की
दहलीज़ पर
हमें तो
यौवन
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

तुम अकारण रो पड़े--
उदास समंदर के किनारे
सूनी आँखों से
हमें तो
अधूरा सा
धरौंदा
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

तुम अकारण रो पड़े--
धुँधली आँखों से
सुलगती लकड़ियाँ देख
हमें तो
कोई
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

पतंग

परदेस के आकाश पर
देसी मांजे से सनी
आकाँक्षाओं से सजी
ऊँची उड़ती मेरी पतंग
दो संस्कृतियों के टकराव में
कई बार कटते -कटते बची
शायद देसी मांजे में दम था
जो टकरा कर भी कट नहीं पाई
और उड़ रही है .....
विदेश के ऊँचे- खुले आकाश पर ....
बेझिझक, बेखौफ ....

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Dec 22 2012

‘हिन्‍दी चेतना’ का जनवरी-मार्च 2013 अंक अब उपलब्‍ध है,


आदरणीय मित्रों


नव वर्ष की शुभकामनाएं


श्री श्‍याम त्रिपाठी तथा सुधा ओम ढींगरा के संपादन में कैनेडा से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'हिन्‍दी चेतना' का जनवरी-मार्च 2013 अंक अब उपलब्‍ध है, जिसमें हैं श्री राजेंद्र यादव का लालित्‍य ललित द्वारा लिया गया विशेष साक्षात्‍कार । विकेश निझावन, रीता कश्‍यप, डॉ स्‍वाति तिवारी की कहानियां । वरिष्‍ठ कहानीकार श्री नरेंद्र कोहली की लम्‍बी कहानी। हाइकु, नवगीत, कविताएं, ग़ज़लें, आलेख, लघुकथाएं, संस्‍मरण, व्‍यंग्‍य। साथ में पुस्तक समीक्षा में दस युवा कथाकारों की पुस्‍तकों पर समीक्षा, साहित्यिक समाचार, चित्र काव्यशाला, विलोम चित्र काव्यशाला और आख़िरी पन्ना । यह अंक अब ऑनलाइन उपलब्‍ध है, पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जाएं ।


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सुधा ओम ढींगरा


संपादक -हिन्दी चेतना



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Sep 29 2012

हिन्दी : प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी

Published by admin under रचना

हिन्दी : प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी
: सुधा ओम ढींगरा

अमेरिका में हिन्दी एक विदेशी भाषा के रूप में जानी -पहचानी और पढ़ी जाती है | पर उसे इस स्वरूप तक लाने के लिए बहुत से भारतीयों ने अथक परिश्रम किया है | विदेश में हिन्दी के लिए वातावरण बनाना और वहीं पर जन्में -पले बच्चों को माँ-बाप की भाषा सिखाना सरल कार्य नहीं | आज हिन्दी, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है | इसके पीछे एक लम्बा संघर्ष है; जिसे बताने की आवश्कता इसलिए है कि पाठक जान पाएँ कि अमेरिका में हिन्दी का कार्य किन -किन रास्तों से निकल कर किया गया है | अमेरिका में रह रहे भारतीयों ने हिन्दी के प्रचार -प्रसार के लिए कई राहें अपनाई | हालाँकि भारतवासियों को वे राहें बेमानी और बेमतलब की लगेंगी पर उन राहों का अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार में बहुत योगदान है |  एक तो विदेश की धरती, दूसरा अमेरिका का भौगोलिक फैलाव | हिन्दी भाषी बिखरे हुए हैं और जब तक उन्हें एक छत तले इकठ्ठा करके इसके बारे में सोचवाया न जाए तब तक हिन्दी का प्रचार -प्रसार करना,  कठिन कार्य था | पर उन्हें एक छत तले लाया कैसे जाए ? यह प्रश्न भी हर क्षण हिन्दी प्रेमियों के आगे खड़ा रहता था | इसे समझने और समझाने के लिए कुछ दशक पहले के पृष्ठ पलटती हूँ ....
सन् पचास और साठ
के दशक में अमेरिका में हिंदी का प्रचार -प्रसार एक चुनौती पूर्ण कार्य था | भिन्न परिवेश और विदेशी भाषा के साम्राज्य में अपनी भाषा को जिन्दा रख पाना दुष्कर था | भारतीय मूल के लोग भारत से अपने साथ अनेक प्रतीक ले कर आए थे | इन प्रतीकों में शामिल थे -जीवन मूल्य, रीति- रिवाज़, पूजा- पद्धति, भाषाएँ, खान -पान की आदतें और पारिवारिक संरचना की परम्पराएँ | पहचान और स्थापना के संघर्ष ने उन्हें अपने में ही इतना उलझा दिया कि नए परिवेश में आकर अस्तित्व की दौड़ दौड़ते हुए, उनके कुछ प्रतीक तो बच गए, कुछ कमज़ोर पड़ गए व कुछ बदल गए | नहीं बदला तो प्रवासी भारतीयों का पारंपरिक भाषा हिन्दी के साथ प्राकृतिक सम्बन्ध और भावनात्मक लगाव | कुछेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाने लगी थी | सन् ६३ -६४ और फिर ६९-७० में अज्ञेय जी बर्कले में अतिथि प्रोफैसर बन कर आए थे | पर आम भारतीय और नई पीढ़ी की हिंदी भाषा के प्रति चेतना शून्य में ही टंगी रही | विश्वविद्यालयों में बहुत कम बच्चे हिन्दी पढ़ने आते थे |
सन् अस्सी तक आते -आते बच्चों को हिंदी भाषा की तरफ आकर्षित करने से अधिक गहन समस्या थी, हिंदी भाषी परिवारों को हिंदी के प्रति, उनकी उदासीनता से उबारना, जो संघर्ष और भिन्न परिवेश में कहीं अनजाने ही पनप गई थी |
हिन्दी के प्रति उनकी उदासीनता ही युवा पीढ़ी को हिन्दी से दूर ले जा रही थी अतः हिन्दी के साथ उनके प्राकृतिक सम्बन्ध और नई पीढ़ी के लिए उन्हें सचेत करना प्रमुख लक्ष्य नज़र आया | उसके लिए एक जुट हो कर कार्य करना बहुत महत्वपूर्ण था | बहुत से हिन्दी प्रेमी निस्वार्थ भाव से तन, मन, धन से हिन्दी भाषा, जो प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी, अस्मिता और पहचान है, के प्रसार -प्रचार के लिए एकत्रित हो गए |
सन्
१९८० में स्वर्गीय डॉ. कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह ने अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की स्थापना  की | सी सुब्रामनियम और के .आर .नारायणन ने इस की नींव डाली | उनके बेटे डॉ. रवि प्रकाश सिंह ने इस संस्था को आगे बढ़ाया | इस संस्था के कई लक्ष्य हैं , उनमें से एक है कवि सम्मलेन करवाना | शुरू से ही इस के पीछे भाव था, इन कवि सम्मेलनों के द्वारा हिन्दी भाषी, हिन्दी प्रेमियों को एक छत तले इकठ्ठा करना, ताकि वे इसके प्रचार -प्रसार के बारे में सोचें और आगामी पीढ़ी को यह भाषा सिखाने के लिए प्रेरित हों | उस समय कवि सम्मेलन ही एक ऐसा माध्यम नज़र आया जिससे हिन्दी भाषी इकट्ठे हो सकते थे | जुलाई १९८३ में पहला कवि सम्मलेन करवाया गया, जिसमें अटल बिहारी बाजपाई और गुलाब खंडेलवाल ने हिस्सा लिया | उसके बाद नीरज , प्रभा ठाकुर और नंद किशोर नौटियाल आए | फिर अनंत शास्त्री एवं जयरमन और १९८५ में वृजेन्द्र अवस्थी और सोम ठाकुर आए | तब तक कवि सम्मेलनों में सिर्फ साहित्य में रूचि रखने वाले या हिन्दी भाषी जो कवि सम्मेलनों को भारत में भी सुनते आए थे और इस पम्परा से परिचित थे, सुनने आते थे | हाँ जागृति स्वरूप कई मंदिरों में हिन्दी स्कूल ज़रूर शुरु हो गए थे, हालाँकि कई शहरों के मंदिरों में पहले से ही हिन्दी पढ़ाई जा रही थी | कई हिन्दी भाषी स्वयं सेवी अध्यापक बने और छोटे बच्चों को हिन्दी पढ़ाने लगे |
अमेरिका में अपने वर्षों के प्रवास और हिंदी के विभिन्न कार्यों से जुड़े होने और १९८५ में यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने के अनुभवों से एक बात महसूस की थी, यहाँ के जन्मे- पले भारतीय मूल के छात्रों को हिंदी भाषा की तरफ तभी आकर्षित कर सकते हैं, अगर यह सहज और सरल तरीके से उन तक पहुँचाई जाए | वाशिंगटन यूनिवर्सिटी , सेंट लुईस में हिन्दी पढ़ाते हुए एहसास हुआ कि
भारतीय मूल के होते हुए भी, यहाँ के छात्र हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में सीखते हैं, अतः शुद्ध हिन्दी की बजाए सरल हिन्दी में उन्हें पढ़ाना पड़ा | मैंने जब हिन्दी फिल्मों के गीतों और फिल्मों के उन दृश्यों का सहारा लिया, जिनसे मैं विद्यार्थियों को हिन्दी की शब्दावली, व्याकरण, रिश्ते, महीने, वर्ष आसानी से और जल्दी से सिखा सकी, तो कक्षा में बच्चों का प्रवेश बढ़ गया | बहुत से अहिन्दी भाषी परिवारों के बच्चे भी हिन्दी क्लासों में प्रवेश लेने लगे | गीतों में संस्कृति भी होती है और आसान से आसान ढंग से हिन्दी पढ़ाने में फिल्मी गीतों का उपयोग कर मैंने यह पाया कि इस तरह से एक तो कक्षा जीवन्त हो उठती थी और दूसरा व्याकरण उन्हें तुरंत समझ में आती थी |
सन् १९८९ में, सेंट लुईस, मिज़ूरी में
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की तरफ से युवा वर्ग के साथ रेडिओ प्रोग्राम शुरू किया गया 'तरंग' | उसमें पहले तो  युवक -युवतियाँ अंग्रेज़ी अधिक और हिन्दी कम बोल पाते थे | फिर धीरे -धीरे हिन्दी का प्रयोग बढ़ गया, गीतों के मुखड़े तक बोलने लगे....'तरंग' में जो विज्ञापन आते थे, वे भी बच्चे और युवा पीढ़ी मिल कर तैयार करते थे...मैं उनकी निर्देशक थी, उनकी परीक्षाओं के दिनों में ही लोग मेरी आवाज़ सुनते थे..एक विज्ञापन का उदाहरण देखें जो बच्चों ने तैयार किया था----
पाँच साल का बच्चा कहता है- '' मम्मी-मम्मी मुझे सीमा ग्रोसरी स्टोर जाना है |''
कालेज की छात्रा कहती है-'' बेटा, कल ही तो गए थे | फिर आज क्यों ?''
बच्चा कहता है --'' मुझे हिन्दी मूवी रेंट करनी है|''
यह विज्ञापन इतना प्रचलित हुआ कि बच्चे घर-घर में यह बोलने लगे, उनको लगा कि अगर दूसरे बच्चे ऐसा बोल सकते हैं तो हम क्यों नहीं..मुझे हिन्दी मूवी रेंट करनी है.. छोटे से छोटा बच्चा भी तोतली आवाज़ में बोलने लगा यह संवाद | दूसरे शहरों में भी रेडिओ से इस तरह के प्रयोग हो रहे थे..हिन्दी के प्रचार- प्रसार में भी इस माध्यम ने बहुत साथ दिया |
अमेरिका में भाषाएँ खेल-खेल में सिखा दी जाती हैं--मेरे सामने पब्लिक ब्राडकास्टिंग
सर्विसिज़ ( पी. बी. एस.) के कार्यक्रम ''सेस मी स्ट्रीट'' का उदाहरण था, जिसमें तरह -तरह की कठपुतलियाँ खेलतीं, आपस में बातचीत करतीं ही बच्चों को अंग्रेज़ी सिखा जाती हैं | यह कार्यक्रम आज भी पी. बी. एस. पर चल रहा है | सन् २००३ में कोलंबिया विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. अंजना संधीर ने एक पुस्तक निकाली -Learn Hindi and Film Songs. यह पुस्तक New York Life Insurance Company ने छपवाई थी और इसकी दस हज़ार कापियाँ पूरे अमेरिका में बच्चों वाले परिवारों को मुफ्त में उपलब्ध करवाई गईं | हिन्दी गानों की यह सशक्त विधा अमेरिका में भाषा -शिक्षण के पाठ्यक्रमों में अधिक प्रभाव के साथ उभरी |
सन् अस्सी से नब्बे के दशक में
बड़े शहरों में तो हिन्दी सिनेमा थियेटर में दिखाया जाता था, पर छोटे शहरों में लोगों को यह सुविधा नहीं थी | हाँ उन दिनों विडिओ प्लेअर बाज़ार में उपलब्ध हो गए थे, प्रवासी भारतीय घर में ही हिन्दी सिनेमा ले आए और घर के वातावरण में गूंजने लगे फिल्मी गाने जो बच्चों को आकर्षित करने लगे | उनकी रिदम तथा बीट उन्हें भाने लगी | सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे उन पर नाचने लगे.. और साथ ही उनके अर्थ और उच्चारण भी सीखने लगे..इसी समय अमेरिका में कम्प्यूटर उद्योग में एक क्रांति आई | भारत से भारी संख्या में युवा भारतीय अमेरिका आए और छोटे -बड़े शहरों के सिनेमा घर हिन्दी फिल्में देखने वालों से भरने लगे | विश्वविद्यालयों में भी भारत से पढ़ने आने वाले छात्र -छात्राओं की संख्या में वृद्धि हुई और साथ ही भारतीय मूल के छात्र भी सिनेमा घरों तक पहुँचने लगे व धड़ल्ले से विश्वविद्यालयों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में फिल्मी गीत गाने लगे | फिल्मी गीतों, लोक गीतों पर भांगड़ा और गिद्धा डलने लगा | भारतीय मूल के छात्रों में एक भारी परिवर्तन आया..विभिन्न भाषा- भाषी परिवारों के छात्र अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिन्दी के शब्द अपनी बातचीत में लाने लगे और हिन्दी फिल्मों पर बातचीत होने लगी |
सन् अस्सी के बाद
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों में भी बहुत बड़ा परिवर्तन आया | काका हाथरसी और वीरेन्द्र तरुण ने १९८३ से १९८९ तक अमरीका के कई कवि सम्मेलनों में हिस्सा लिया और इन कवि सम्मेलनों में हिन्दी भाषी और अहिन्दी भाषी श्रोता आए | कवि सम्मेलनों में श्रोताओं की संख्या पहले से कुछ बढ़ी | लोगों की माँग पर कवि सम्मेलनों में हास्य -व्यंग्य के कवि और गीतकार भारत से बुलाए जाने लगे | हिन्दी-प्रेमियों को एक जगह एकत्रित करने की राह मिल गई | अशोक चक्रधर, कुँअर बेचैन, माधवी लता शुक्ल, हुल्लड़ मुरादाबादी, बृजेन्द्र अवस्थी, गोविन्द व्यास , सुरेन्द्र सुकुमार, सुरेन्द्र दुबे, राकेश मधुकर, अलबेला खत्री , विष्णु सक्सेना, मनजीत सिंह, सत्यनारायण मौर्य बाबा, ओम व्यास, गजेन्द्र सोलंकी, अभिनव शुक्ल, उदय प्रताप सिंह, राजेन्द्र राजन, सुनील जोगी, सुरेश अवस्थी ने अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों के मंचों की शोभा बढ़ाई | हर वर्ष श्रोता बढ़ते गए | गत वर्ष २०१० के कवि सम्मेलनों में आश कारण अटल, महेन्द्र अजनबी और अरुण जैमिनी ने हिस्सा लिया और श्रोताओं की संख्या कई शहरों में ७०० से ऊपर चली गई | अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने २०११ में विष्णु सक्सेना , सर्वेश अस्थाना , प्रवीण शुक्ला को बुलाया है और २०१२ में गजेन्द्र सोलंकी, सरिता शर्मा और संजय झाला को बुलाया | अमेरिका और कैनेडा के १५ से १८ शहरों में कवि सम्मलेन करवाए जाते हैं | हिन्दी भाषिओं के साथ, अहिन्दी भाषी और पाकिस्तान के लोग भी इन कवि सम्मेलनों को सुनने आते हैं | स्वस्थ मनोरंजन के साथ- साथ इन कार्यक्रमों से भाषा को सुनने -समझने की शक्ति सहज रूप में स्वतः पुष्ट होती रहती है | कुछ साहित्यकार जो गम्भीर साहित्य के प्रेमी हैं इन कवि सम्मेलनों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं...पर वे ये नहीं जानते कि अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कविसम्मेलनों का उद्देश्य साहित्य या साहित्यकारों को तुष्ट करना नहीं है, उसके लिए और बहुत से माध्यम हैं | जनता के साथ जुड़ना व उन्हें अपने साथ जोड़ना और फिर हँसते-हँसते भाषा का आनन्द लेते हुए, नई पीढ़ी को इस विधा से परिचित करवाना और उनमें भाषा के प्रति मोह पैदा करना ही इन कवि सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य है | आज कल कवि सम्मेलनों में युवा वर्ग ने भी बहुत उत्साह दिखाना शुरू कर दिया है | उन्होंने ने तो यहाँ तक कह दिया कि वे म्यूज़िकल कोंसर्ट्स में जाने की बजाए कवि सम्मेलनों में आना अधिक पसन्द करेंगे |
युवा वर्ग पिछले कई वर्षों से कवि सम्मेलनों में लगातार आ रहे हैं..पहले संख्या में कम होते थे पर अब दो- तीन वर्षों से इनकी संख्या भी बढ़ गई है..कारण..कवि सम्मेलनों में कवियों की अभिव्यक्ति और संवाद में सहजता होती है | हँसी -हँसी में वे बात भी कह जाते हैं, बात भीतर तक पहुँच भी जाती है और बुद्धि पर ज़ोर भी नहीं पड़ता | युवा वर्ग के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है | नार्थ कैरोलाईना के विश्वविद्यालयों में हिन्दी छात्रों को कविताएँ पढ़ाई जाती हैं, वे इन कवि सम्मेलनों में आते  हैं और उन पर बातचीत भी करते हैं..
युवक मनीष एन. सी. स्टेट से पढ़ा है और हमारे कवि सम्मेलनों में वर्षों से आ रहा है, अब उसकी पत्नी भी उसके साथ आने लगी है | उसकी पत्नी सलोनी ने जब मुझे निवेदन किया कि विष्णु सक्सेना को बुलाया जाए तो मैं हैरान रह गई | इसने तो उन्हें सुना भी नहीं, वह मेरे भाव देख कर मुस्करा पड़ी और उसने अपनी शादी का मनोरंजक किस्सा मुझे सुनाया---मनीष उसे प्रणय निवेदन नहीं कर पा रहा था..वह जानती थी कि वह उसे चाहता है ..पर कह नहीं पा रहा था ..सात वर्ष पहले कवि सम्मलेन में विष्णु सक्सेना को सुन कर, उसी रात उसने उसे प्रोपोज़ कर दिया, बोला कुछ नहीं बस उनके गीत की चार पंक्तियाँ गा दीं---
'' दिल की कोरी किताब लाया हूँ ,
नरम नाज़ुक गुलाब लाया हूँ ,
तुमने डर-डर के जो लिखे ही नहीं,
उन ख़तों के जवाब लाया हूँ.''
वह इस के शब्दों के स्वरों से प्रभावित हुई..सलोनी हिन्दी भाषी परिवार से है, पर उसकी हिन्दी में कोई रूचि नहीं थी | माँ -बाप घर में हिन्दी बोलते हैं, उनके वार्तालाप में उसने इन शब्दों को बचपन से सुना था | पर कभी माँ -बाप की भाषा सीखने की इच्छा नहीं हुई थी उसकी | विष्णु सक्सेना की पंक्तियों के अर्थ जानने के बाद वह इतनी तरंगित और उत्साहित हुई कि हिन्दी सीखने लगी | और अब वह  हमारे कवि सम्मेलनों की स्थाई श्रोता है | वर्षों पहले अशोक चक्रधर और कुँअर बेचैन के कार्यक्रम के बाद भी ऐसी ही घटना हुई थी | युवा हरीश आम्बले ने मीना श्रीवास्तव को कवि सम्मलेन के बाद ही वहीं पर प्रणय निवेदन किया था और आज तक वे
कुँअर बेचैन के प्रशंसक और हमारे कवि सम्मेलनों के सबसे बड़े श्रोता हैं |
युवा पीढ़ी के अवचेतन में हिन्दी भाषा अपनी गरिमा और सौन्दर्य के साथ स्थान बनाए हुए कहीं कोने में पड़ी होती है, माँ -बाप की भाषा के रूप में, हिन्दी सिनेमा की भाषा के रूप में, या हिन्दी गानों की भाषा के रूप में....और हिन्दी साहित्य से उनका परिचय नहीं होता (कुछेक विद्यार्थियों को छोड़ कर) | कवि सम्मेलनों में उन्हें कविता, गीत, ग़ज़ल आसानी से समझ आ जाती है और चेतना जागृत हो उठती है | इस विधा का जब वे रस्सावदन कर लेते हैं, तो यू ट्यूब पर जा कर भी इन कवियों को सुनते हैं | फिर ढूँढ -ढूँढ कर और सुनते हैं...
२०१० के कार्यक्रमों में मुझे दो बहुत मनोरंजक अनुभव हुए | मध्यांतर के बाद एक किशोर आया (जो कवि सम्मेलन के लिए स्वयं सेवी था, हाई स्कूल में बच्चे  स्वयं सेवा बहुत करते हैं--कालेज प्रवेश के लिए इसकी बहुत ज़रुरत होती है) कहने लगा-''आंटी मैं पहली बार इस तरह का कार्यक्रम सुन रहा हूँ, मेरे मम्मी-डैड  तो हर साल आते हैं,मैं कभी नहीं आया, पर मैं कई बातें समझ सका हूँ और हँसा भी बहुत हूँ |''
मैंने उत्सुकता से पूछा--'' तुम्हें क्या समझ आया और तुम किस बात पर हँसे|''
''आंटी , बीड़ी वाली कविता को मैंने बहुत एन्जॉय किया | जब भी मैं
मम्मी -डैड के साथ मुम्बई जाता हूँ , तो ट्रेन में ऐसे ही लगता है....''
वह ट्रेन की भीड़ पर सुनाई गई महेन्द्र अजनबी की हास्य व्यंग्य की कविता की बात कर रहा था |
''अच्छा तो आप को हँसी किस बात पर आई'' -मैंने फिर पूछा |
''कई बातों पर --वह कुत्ते और ऊंट वाली कविता का मज़ा आया | ''
वह अरुण जैमिनी जी की कविता की बात कर रहा था |
''क्या आप अगले साल कवि सम्मलेन सुनने आएंगे ?''
''छुट्टियों में हुआ, तो ज़रूर आऊँगा '' कह कर वह अपने दोस्तों के साथ चला गया |
दूसरा अनुभव मुझे कार्यक्रम के बाद घर जाने से पहले हुआ, एक युवती मेरे पास आई और मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों में कस कर बोली --''आंटी, मैं यू .एन. सी की स्टुडेंट हूँ और
यहाँ पढ़ने के लिए भारत से आई हूँ,  मेरा पुरुष मित्र आज मुझे यहाँ ले कर आया है | उसे कविता का शौक है | मैं तो उम्र भर अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ी हूँ और मेरा परिवार हिन्दी भाषा को हेय दृष्टि से देखता है | घर में अंग्रेज़ी ही बोली जाती है | पर आज जिस अनुभव से मैं गुज़री हूँ, भारत में तो उसका कभी एहसास ही नहीं कर पाती | '' फिर उसने मुझे आलिंगन में बाँध लिया और ईमेल एड्रेस देते हुए बोली -''यह है मेरा ईमेल, आगे कोई भी कार्यक्रम हो तो मुझे ज़रूर बताना प्लीज़ |''
इस तरह के अनुभव तो हर कार्यक्रम के बाद होते हैं |
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों की संयोजक हूँ, पूरे अमेरिका से भी इमेल्स और फ़ोन काल्स द्वारा युवा वर्ग के विचार मिलते रहते हैं | ये कवि सम्मलेन परोक्ष -अपरोक्ष रूप से चेतना -अवचेतना में बहुत सकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं..तभी तो हर वर्ष पहले से अधिक लोग सुनने आते हैं | छह महीने पहले से ही पूछने लगते है कि कवि सम्मलेन कब हो रहा है.... और इमेल्स से अपनी -अपनी पसन्द बताने लगते हैं | पूरा वर्ष कवियों के चुटकले और हास्य की कविताएँ पार्टियों में सुनाते रहते हैं | कई तो कवियों की पुस्तकें महफिलों में ले कर आते हैं और उन में से मन पसन्द कविताएँ पढ़ कर सुनाते हैं |
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों से प्रभावित हो कर, कई अन्य समितियों ने भी कवि सम्मेलन करवाए, जिनमें सुरेन्द्र शर्मा, मानिक वर्मा, बाल कवि वैरागी इत्यादि आए | अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति से तीन संस्थाओं ने जन्म लिया --अखिल विश्व हिन्दी समिति, हिन्दी न्यास और हिन्दी यू. एस. ए. | अखिल विश्व हिन्दी समिति और हिन्दी न्यास तो अमरीका के कवियों के कवि सम्मलेन करवाते हैं और अखिल विश्व हिन्दी समिति कभी -कभी भारत से भी कवि बुला लेते हैं | हिन्दी यू. एस. ए. हर साल हिन्दी महोत्सव कार्यक्रम करते हैं, जिसमें वे भारत से कवि बुला कर कवि सम्मलेन करवाते हैं, पर यह कार्यक्रम मुख्य रूप से नई पीढ़ी का होता है | कवि सम्मेलनों का ही प्रभाव है कि १५०० बच्चों का कविता पाठ करवाया जाता है और सिर्फ ८० कवि बच्चे उनमें से चुने जाते हैं | हिन्दी महोत्सव से कई दिन पहले यह प्रतियोगिता शुरू हो जाती है | बच्चे जब कविता सुनाते हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि कवि सम्मेलनों का भविष्य अमेरिका में सुरक्षित है और कविता कहने की यह विधा और परम्परा युवा पीढ़ी में प्रचलित हो रही है | हिन्दी यू. एस. ए के ३० से ऊपर स्कूल हैं जिनमें हिन्दी पढ़ाई जाती है, ३००० से अधिक विद्यार्थी हिन्दी पढ़ते हैं, २५० अध्यापक और ७० स्वयं सेवी हैं |
अमरीका के हर शहर में प्रवासी भारतीय लघु भारत बसाए हुए हैं और विभिन्न भाषा- भाषी आपसी संवाद के रूप में हिन्दी का प्रयोग अधिक कर रहे हैं.. हिन्दी के इस निरन्तर बढ़ते प्रयोग के लिए हिन्दी सिनेमा और हिन्दी दूरदर्शन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सराहनीय है | विडिओ टैक्नालोजी और उपग्रह रेडिओ संचरण के माध्यम से हज़ारों मील दूर बसे प्रवासी भारतीयों के घरों में आज भारतीय सिनेमा, टेलिविज़न और रेडियो सहज ही पहुँच रहे हैं | इस कारण प्रवासी भारतीयों का अपने भारत से सम्बन्ध बराबर बना रहता है | वे सजीव समाचारों के माध्यम से वहाँ की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति से भी अवगत रहते हैं..अपनी भाषा को सीखने और सुरक्षित रखने की जागरूकता भी उनमें बढ़ गई है | हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या विश्वविद्यालयों में लगातार बढ़ती जा रही है और हिन्दी में मास्टर और पीएचडी करवाने की कोशिश जारी है |
अमेरिका के साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य को भी समृद्ध किया है | ३०० के क़रीब कविता -कहानी संग्रह और उपन्यास यहाँ के साहित्यकारों के आ चुके हैं | कई साहित्यकार साहित्य की मुख्य धारा का अंग बन चुके हैं |
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से 'विश्वा', हिन्दी न्यास की तरफ़ से 'हिन्दी जगत', अखिल विश्व हिन्दी समिति की 'सौरभ' और हिन्दी यूएसए की 'कर्म भूमि' पत्रिकाएँ छपती हैं | अमरीका और कैनेडा के संयुक्त प्रयास से हिन्दी प्रचारिणी सभा की पत्रिका 'हिन्दी चेतना' पिछले १५ वर्षों से नियमित और निरन्तर छप रही है तथा स्तरीय पत्रिका के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर रही है | यह सर्कुलेशन में सबसे अधिक है |
हिन्दी को युवाओं की चेतना बनाने का संघर्ष अभी भी जारी है |



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