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Sep 29 2012

हिन्दी : प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी

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हिन्दी : प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी
: सुधा ओम ढींगरा

अमेरिका में हिन्दी एक विदेशी भाषा के रूप में जानी -पहचानी और पढ़ी जाती है | पर उसे इस स्वरूप तक लाने के लिए बहुत से भारतीयों ने अथक परिश्रम किया है | विदेश में हिन्दी के लिए वातावरण बनाना और वहीं पर जन्में -पले बच्चों को माँ-बाप की भाषा सिखाना सरल कार्य नहीं | आज हिन्दी, विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है | इसके पीछे एक लम्बा संघर्ष है; जिसे बताने की आवश्कता इसलिए है कि पाठक जान पाएँ कि अमेरिका में हिन्दी का कार्य किन -किन रास्तों से निकल कर किया गया है | अमेरिका में रह रहे भारतीयों ने हिन्दी के प्रचार -प्रसार के लिए कई राहें अपनाई | हालाँकि भारतवासियों को वे राहें बेमानी और बेमतलब की लगेंगी पर उन राहों का अमेरिका में हिन्दी के प्रचार -प्रसार में बहुत योगदान है |  एक तो विदेश की धरती, दूसरा अमेरिका का भौगोलिक फैलाव | हिन्दी भाषी बिखरे हुए हैं और जब तक उन्हें एक छत तले इकठ्ठा करके इसके बारे में सोचवाया न जाए तब तक हिन्दी का प्रचार -प्रसार करना,  कठिन कार्य था | पर उन्हें एक छत तले लाया कैसे जाए ? यह प्रश्न भी हर क्षण हिन्दी प्रेमियों के आगे खड़ा रहता था | इसे समझने और समझाने के लिए कुछ दशक पहले के पृष्ठ पलटती हूँ ....
सन् पचास और साठ
के दशक में अमेरिका में हिंदी का प्रचार -प्रसार एक चुनौती पूर्ण कार्य था | भिन्न परिवेश और विदेशी भाषा के साम्राज्य में अपनी भाषा को जिन्दा रख पाना दुष्कर था | भारतीय मूल के लोग भारत से अपने साथ अनेक प्रतीक ले कर आए थे | इन प्रतीकों में शामिल थे -जीवन मूल्य, रीति- रिवाज़, पूजा- पद्धति, भाषाएँ, खान -पान की आदतें और पारिवारिक संरचना की परम्पराएँ | पहचान और स्थापना के संघर्ष ने उन्हें अपने में ही इतना उलझा दिया कि नए परिवेश में आकर अस्तित्व की दौड़ दौड़ते हुए, उनके कुछ प्रतीक तो बच गए, कुछ कमज़ोर पड़ गए व कुछ बदल गए | नहीं बदला तो प्रवासी भारतीयों का पारंपरिक भाषा हिन्दी के साथ प्राकृतिक सम्बन्ध और भावनात्मक लगाव | कुछेक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाने लगी थी | सन् ६३ -६४ और फिर ६९-७० में अज्ञेय जी बर्कले में अतिथि प्रोफैसर बन कर आए थे | पर आम भारतीय और नई पीढ़ी की हिंदी भाषा के प्रति चेतना शून्य में ही टंगी रही | विश्वविद्यालयों में बहुत कम बच्चे हिन्दी पढ़ने आते थे |
सन् अस्सी तक आते -आते बच्चों को हिंदी भाषा की तरफ आकर्षित करने से अधिक गहन समस्या थी, हिंदी भाषी परिवारों को हिंदी के प्रति, उनकी उदासीनता से उबारना, जो संघर्ष और भिन्न परिवेश में कहीं अनजाने ही पनप गई थी |
हिन्दी के प्रति उनकी उदासीनता ही युवा पीढ़ी को हिन्दी से दूर ले जा रही थी अतः हिन्दी के साथ उनके प्राकृतिक सम्बन्ध और नई पीढ़ी के लिए उन्हें सचेत करना प्रमुख लक्ष्य नज़र आया | उसके लिए एक जुट हो कर कार्य करना बहुत महत्वपूर्ण था | बहुत से हिन्दी प्रेमी निस्वार्थ भाव से तन, मन, धन से हिन्दी भाषा, जो प्रवासी भारतीयों के माथे की बिंदी, अस्मिता और पहचान है, के प्रसार -प्रचार के लिए एकत्रित हो गए |
सन्
१९८० में स्वर्गीय डॉ. कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह ने अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की स्थापना  की | सी सुब्रामनियम और के .आर .नारायणन ने इस की नींव डाली | उनके बेटे डॉ. रवि प्रकाश सिंह ने इस संस्था को आगे बढ़ाया | इस संस्था के कई लक्ष्य हैं , उनमें से एक है कवि सम्मलेन करवाना | शुरू से ही इस के पीछे भाव था, इन कवि सम्मेलनों के द्वारा हिन्दी भाषी, हिन्दी प्रेमियों को एक छत तले इकठ्ठा करना, ताकि वे इसके प्रचार -प्रसार के बारे में सोचें और आगामी पीढ़ी को यह भाषा सिखाने के लिए प्रेरित हों | उस समय कवि सम्मेलन ही एक ऐसा माध्यम नज़र आया जिससे हिन्दी भाषी इकट्ठे हो सकते थे | जुलाई १९८३ में पहला कवि सम्मलेन करवाया गया, जिसमें अटल बिहारी बाजपाई और गुलाब खंडेलवाल ने हिस्सा लिया | उसके बाद नीरज , प्रभा ठाकुर और नंद किशोर नौटियाल आए | फिर अनंत शास्त्री एवं जयरमन और १९८५ में वृजेन्द्र अवस्थी और सोम ठाकुर आए | तब तक कवि सम्मेलनों में सिर्फ साहित्य में रूचि रखने वाले या हिन्दी भाषी जो कवि सम्मेलनों को भारत में भी सुनते आए थे और इस पम्परा से परिचित थे, सुनने आते थे | हाँ जागृति स्वरूप कई मंदिरों में हिन्दी स्कूल ज़रूर शुरु हो गए थे, हालाँकि कई शहरों के मंदिरों में पहले से ही हिन्दी पढ़ाई जा रही थी | कई हिन्दी भाषी स्वयं सेवी अध्यापक बने और छोटे बच्चों को हिन्दी पढ़ाने लगे |
अमेरिका में अपने वर्षों के प्रवास और हिंदी के विभिन्न कार्यों से जुड़े होने और १९८५ में यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाने के अनुभवों से एक बात महसूस की थी, यहाँ के जन्मे- पले भारतीय मूल के छात्रों को हिंदी भाषा की तरफ तभी आकर्षित कर सकते हैं, अगर यह सहज और सरल तरीके से उन तक पहुँचाई जाए | वाशिंगटन यूनिवर्सिटी , सेंट लुईस में हिन्दी पढ़ाते हुए एहसास हुआ कि
भारतीय मूल के होते हुए भी, यहाँ के छात्र हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में सीखते हैं, अतः शुद्ध हिन्दी की बजाए सरल हिन्दी में उन्हें पढ़ाना पड़ा | मैंने जब हिन्दी फिल्मों के गीतों और फिल्मों के उन दृश्यों का सहारा लिया, जिनसे मैं विद्यार्थियों को हिन्दी की शब्दावली, व्याकरण, रिश्ते, महीने, वर्ष आसानी से और जल्दी से सिखा सकी, तो कक्षा में बच्चों का प्रवेश बढ़ गया | बहुत से अहिन्दी भाषी परिवारों के बच्चे भी हिन्दी क्लासों में प्रवेश लेने लगे | गीतों में संस्कृति भी होती है और आसान से आसान ढंग से हिन्दी पढ़ाने में फिल्मी गीतों का उपयोग कर मैंने यह पाया कि इस तरह से एक तो कक्षा जीवन्त हो उठती थी और दूसरा व्याकरण उन्हें तुरंत समझ में आती थी |
सन् १९८९ में, सेंट लुईस, मिज़ूरी में
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की तरफ से युवा वर्ग के साथ रेडिओ प्रोग्राम शुरू किया गया 'तरंग' | उसमें पहले तो  युवक -युवतियाँ अंग्रेज़ी अधिक और हिन्दी कम बोल पाते थे | फिर धीरे -धीरे हिन्दी का प्रयोग बढ़ गया, गीतों के मुखड़े तक बोलने लगे....'तरंग' में जो विज्ञापन आते थे, वे भी बच्चे और युवा पीढ़ी मिल कर तैयार करते थे...मैं उनकी निर्देशक थी, उनकी परीक्षाओं के दिनों में ही लोग मेरी आवाज़ सुनते थे..एक विज्ञापन का उदाहरण देखें जो बच्चों ने तैयार किया था----
पाँच साल का बच्चा कहता है- '' मम्मी-मम्मी मुझे सीमा ग्रोसरी स्टोर जाना है |''
कालेज की छात्रा कहती है-'' बेटा, कल ही तो गए थे | फिर आज क्यों ?''
बच्चा कहता है --'' मुझे हिन्दी मूवी रेंट करनी है|''
यह विज्ञापन इतना प्रचलित हुआ कि बच्चे घर-घर में यह बोलने लगे, उनको लगा कि अगर दूसरे बच्चे ऐसा बोल सकते हैं तो हम क्यों नहीं..मुझे हिन्दी मूवी रेंट करनी है.. छोटे से छोटा बच्चा भी तोतली आवाज़ में बोलने लगा यह संवाद | दूसरे शहरों में भी रेडिओ से इस तरह के प्रयोग हो रहे थे..हिन्दी के प्रचार- प्रसार में भी इस माध्यम ने बहुत साथ दिया |
अमेरिका में भाषाएँ खेल-खेल में सिखा दी जाती हैं--मेरे सामने पब्लिक ब्राडकास्टिंग
सर्विसिज़ ( पी. बी. एस.) के कार्यक्रम ''सेस मी स्ट्रीट'' का उदाहरण था, जिसमें तरह -तरह की कठपुतलियाँ खेलतीं, आपस में बातचीत करतीं ही बच्चों को अंग्रेज़ी सिखा जाती हैं | यह कार्यक्रम आज भी पी. बी. एस. पर चल रहा है | सन् २००३ में कोलंबिया विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. अंजना संधीर ने एक पुस्तक निकाली -Learn Hindi and Film Songs. यह पुस्तक New York Life Insurance Company ने छपवाई थी और इसकी दस हज़ार कापियाँ पूरे अमेरिका में बच्चों वाले परिवारों को मुफ्त में उपलब्ध करवाई गईं | हिन्दी गानों की यह सशक्त विधा अमेरिका में भाषा -शिक्षण के पाठ्यक्रमों में अधिक प्रभाव के साथ उभरी |
सन् अस्सी से नब्बे के दशक में
बड़े शहरों में तो हिन्दी सिनेमा थियेटर में दिखाया जाता था, पर छोटे शहरों में लोगों को यह सुविधा नहीं थी | हाँ उन दिनों विडिओ प्लेअर बाज़ार में उपलब्ध हो गए थे, प्रवासी भारतीय घर में ही हिन्दी सिनेमा ले आए और घर के वातावरण में गूंजने लगे फिल्मी गाने जो बच्चों को आकर्षित करने लगे | उनकी रिदम तथा बीट उन्हें भाने लगी | सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे उन पर नाचने लगे.. और साथ ही उनके अर्थ और उच्चारण भी सीखने लगे..इसी समय अमेरिका में कम्प्यूटर उद्योग में एक क्रांति आई | भारत से भारी संख्या में युवा भारतीय अमेरिका आए और छोटे -बड़े शहरों के सिनेमा घर हिन्दी फिल्में देखने वालों से भरने लगे | विश्वविद्यालयों में भी भारत से पढ़ने आने वाले छात्र -छात्राओं की संख्या में वृद्धि हुई और साथ ही भारतीय मूल के छात्र भी सिनेमा घरों तक पहुँचने लगे व धड़ल्ले से विश्वविद्यालयों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में फिल्मी गीत गाने लगे | फिल्मी गीतों, लोक गीतों पर भांगड़ा और गिद्धा डलने लगा | भारतीय मूल के छात्रों में एक भारी परिवर्तन आया..विभिन्न भाषा- भाषी परिवारों के छात्र अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिन्दी के शब्द अपनी बातचीत में लाने लगे और हिन्दी फिल्मों पर बातचीत होने लगी |
सन् अस्सी के बाद
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों में भी बहुत बड़ा परिवर्तन आया | काका हाथरसी और वीरेन्द्र तरुण ने १९८३ से १९८९ तक अमरीका के कई कवि सम्मेलनों में हिस्सा लिया और इन कवि सम्मेलनों में हिन्दी भाषी और अहिन्दी भाषी श्रोता आए | कवि सम्मेलनों में श्रोताओं की संख्या पहले से कुछ बढ़ी | लोगों की माँग पर कवि सम्मेलनों में हास्य -व्यंग्य के कवि और गीतकार भारत से बुलाए जाने लगे | हिन्दी-प्रेमियों को एक जगह एकत्रित करने की राह मिल गई | अशोक चक्रधर, कुँअर बेचैन, माधवी लता शुक्ल, हुल्लड़ मुरादाबादी, बृजेन्द्र अवस्थी, गोविन्द व्यास , सुरेन्द्र सुकुमार, सुरेन्द्र दुबे, राकेश मधुकर, अलबेला खत्री , विष्णु सक्सेना, मनजीत सिंह, सत्यनारायण मौर्य बाबा, ओम व्यास, गजेन्द्र सोलंकी, अभिनव शुक्ल, उदय प्रताप सिंह, राजेन्द्र राजन, सुनील जोगी, सुरेश अवस्थी ने अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों के मंचों की शोभा बढ़ाई | हर वर्ष श्रोता बढ़ते गए | गत वर्ष २०१० के कवि सम्मेलनों में आश कारण अटल, महेन्द्र अजनबी और अरुण जैमिनी ने हिस्सा लिया और श्रोताओं की संख्या कई शहरों में ७०० से ऊपर चली गई | अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति ने २०११ में विष्णु सक्सेना , सर्वेश अस्थाना , प्रवीण शुक्ला को बुलाया है और २०१२ में गजेन्द्र सोलंकी, सरिता शर्मा और संजय झाला को बुलाया | अमेरिका और कैनेडा के १५ से १८ शहरों में कवि सम्मलेन करवाए जाते हैं | हिन्दी भाषिओं के साथ, अहिन्दी भाषी और पाकिस्तान के लोग भी इन कवि सम्मेलनों को सुनने आते हैं | स्वस्थ मनोरंजन के साथ- साथ इन कार्यक्रमों से भाषा को सुनने -समझने की शक्ति सहज रूप में स्वतः पुष्ट होती रहती है | कुछ साहित्यकार जो गम्भीर साहित्य के प्रेमी हैं इन कवि सम्मेलनों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं...पर वे ये नहीं जानते कि अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कविसम्मेलनों का उद्देश्य साहित्य या साहित्यकारों को तुष्ट करना नहीं है, उसके लिए और बहुत से माध्यम हैं | जनता के साथ जुड़ना व उन्हें अपने साथ जोड़ना और फिर हँसते-हँसते भाषा का आनन्द लेते हुए, नई पीढ़ी को इस विधा से परिचित करवाना और उनमें भाषा के प्रति मोह पैदा करना ही इन कवि सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य है | आज कल कवि सम्मेलनों में युवा वर्ग ने भी बहुत उत्साह दिखाना शुरू कर दिया है | उन्होंने ने तो यहाँ तक कह दिया कि वे म्यूज़िकल कोंसर्ट्स में जाने की बजाए कवि सम्मेलनों में आना अधिक पसन्द करेंगे |
युवा वर्ग पिछले कई वर्षों से कवि सम्मेलनों में लगातार आ रहे हैं..पहले संख्या में कम होते थे पर अब दो- तीन वर्षों से इनकी संख्या भी बढ़ गई है..कारण..कवि सम्मेलनों में कवियों की अभिव्यक्ति और संवाद में सहजता होती है | हँसी -हँसी में वे बात भी कह जाते हैं, बात भीतर तक पहुँच भी जाती है और बुद्धि पर ज़ोर भी नहीं पड़ता | युवा वर्ग के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है | नार्थ कैरोलाईना के विश्वविद्यालयों में हिन्दी छात्रों को कविताएँ पढ़ाई जाती हैं, वे इन कवि सम्मेलनों में आते  हैं और उन पर बातचीत भी करते हैं..
युवक मनीष एन. सी. स्टेट से पढ़ा है और हमारे कवि सम्मेलनों में वर्षों से आ रहा है, अब उसकी पत्नी भी उसके साथ आने लगी है | उसकी पत्नी सलोनी ने जब मुझे निवेदन किया कि विष्णु सक्सेना को बुलाया जाए तो मैं हैरान रह गई | इसने तो उन्हें सुना भी नहीं, वह मेरे भाव देख कर मुस्करा पड़ी और उसने अपनी शादी का मनोरंजक किस्सा मुझे सुनाया---मनीष उसे प्रणय निवेदन नहीं कर पा रहा था..वह जानती थी कि वह उसे चाहता है ..पर कह नहीं पा रहा था ..सात वर्ष पहले कवि सम्मलेन में विष्णु सक्सेना को सुन कर, उसी रात उसने उसे प्रोपोज़ कर दिया, बोला कुछ नहीं बस उनके गीत की चार पंक्तियाँ गा दीं---
'' दिल की कोरी किताब लाया हूँ ,
नरम नाज़ुक गुलाब लाया हूँ ,
तुमने डर-डर के जो लिखे ही नहीं,
उन ख़तों के जवाब लाया हूँ.''
वह इस के शब्दों के स्वरों से प्रभावित हुई..सलोनी हिन्दी भाषी परिवार से है, पर उसकी हिन्दी में कोई रूचि नहीं थी | माँ -बाप घर में हिन्दी बोलते हैं, उनके वार्तालाप में उसने इन शब्दों को बचपन से सुना था | पर कभी माँ -बाप की भाषा सीखने की इच्छा नहीं हुई थी उसकी | विष्णु सक्सेना की पंक्तियों के अर्थ जानने के बाद वह इतनी तरंगित और उत्साहित हुई कि हिन्दी सीखने लगी | और अब वह  हमारे कवि सम्मेलनों की स्थाई श्रोता है | वर्षों पहले अशोक चक्रधर और कुँअर बेचैन के कार्यक्रम के बाद भी ऐसी ही घटना हुई थी | युवा हरीश आम्बले ने मीना श्रीवास्तव को कवि सम्मलेन के बाद ही वहीं पर प्रणय निवेदन किया था और आज तक वे
कुँअर बेचैन के प्रशंसक और हमारे कवि सम्मेलनों के सबसे बड़े श्रोता हैं |
युवा पीढ़ी के अवचेतन में हिन्दी भाषा अपनी गरिमा और सौन्दर्य के साथ स्थान बनाए हुए कहीं कोने में पड़ी होती है, माँ -बाप की भाषा के रूप में, हिन्दी सिनेमा की भाषा के रूप में, या हिन्दी गानों की भाषा के रूप में....और हिन्दी साहित्य से उनका परिचय नहीं होता (कुछेक विद्यार्थियों को छोड़ कर) | कवि सम्मेलनों में उन्हें कविता, गीत, ग़ज़ल आसानी से समझ आ जाती है और चेतना जागृत हो उठती है | इस विधा का जब वे रस्सावदन कर लेते हैं, तो यू ट्यूब पर जा कर भी इन कवियों को सुनते हैं | फिर ढूँढ -ढूँढ कर और सुनते हैं...
२०१० के कार्यक्रमों में मुझे दो बहुत मनोरंजक अनुभव हुए | मध्यांतर के बाद एक किशोर आया (जो कवि सम्मेलन के लिए स्वयं सेवी था, हाई स्कूल में बच्चे  स्वयं सेवा बहुत करते हैं--कालेज प्रवेश के लिए इसकी बहुत ज़रुरत होती है) कहने लगा-''आंटी मैं पहली बार इस तरह का कार्यक्रम सुन रहा हूँ, मेरे मम्मी-डैड  तो हर साल आते हैं,मैं कभी नहीं आया, पर मैं कई बातें समझ सका हूँ और हँसा भी बहुत हूँ |''
मैंने उत्सुकता से पूछा--'' तुम्हें क्या समझ आया और तुम किस बात पर हँसे|''
''आंटी , बीड़ी वाली कविता को मैंने बहुत एन्जॉय किया | जब भी मैं
मम्मी -डैड के साथ मुम्बई जाता हूँ , तो ट्रेन में ऐसे ही लगता है....''
वह ट्रेन की भीड़ पर सुनाई गई महेन्द्र अजनबी की हास्य व्यंग्य की कविता की बात कर रहा था |
''अच्छा तो आप को हँसी किस बात पर आई'' -मैंने फिर पूछा |
''कई बातों पर --वह कुत्ते और ऊंट वाली कविता का मज़ा आया | ''
वह अरुण जैमिनी जी की कविता की बात कर रहा था |
''क्या आप अगले साल कवि सम्मलेन सुनने आएंगे ?''
''छुट्टियों में हुआ, तो ज़रूर आऊँगा '' कह कर वह अपने दोस्तों के साथ चला गया |
दूसरा अनुभव मुझे कार्यक्रम के बाद घर जाने से पहले हुआ, एक युवती मेरे पास आई और मेरे दोनों हाथों को अपने हाथों में कस कर बोली --''आंटी, मैं यू .एन. सी की स्टुडेंट हूँ और
यहाँ पढ़ने के लिए भारत से आई हूँ,  मेरा पुरुष मित्र आज मुझे यहाँ ले कर आया है | उसे कविता का शौक है | मैं तो उम्र भर अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ी हूँ और मेरा परिवार हिन्दी भाषा को हेय दृष्टि से देखता है | घर में अंग्रेज़ी ही बोली जाती है | पर आज जिस अनुभव से मैं गुज़री हूँ, भारत में तो उसका कभी एहसास ही नहीं कर पाती | '' फिर उसने मुझे आलिंगन में बाँध लिया और ईमेल एड्रेस देते हुए बोली -''यह है मेरा ईमेल, आगे कोई भी कार्यक्रम हो तो मुझे ज़रूर बताना प्लीज़ |''
इस तरह के अनुभव तो हर कार्यक्रम के बाद होते हैं |
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों की संयोजक हूँ, पूरे अमेरिका से भी इमेल्स और फ़ोन काल्स द्वारा युवा वर्ग के विचार मिलते रहते हैं | ये कवि सम्मलेन परोक्ष -अपरोक्ष रूप से चेतना -अवचेतना में बहुत सकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं..तभी तो हर वर्ष पहले से अधिक लोग सुनने आते हैं | छह महीने पहले से ही पूछने लगते है कि कवि सम्मलेन कब हो रहा है.... और इमेल्स से अपनी -अपनी पसन्द बताने लगते हैं | पूरा वर्ष कवियों के चुटकले और हास्य की कविताएँ पार्टियों में सुनाते रहते हैं | कई तो कवियों की पुस्तकें महफिलों में ले कर आते हैं और उन में से मन पसन्द कविताएँ पढ़ कर सुनाते हैं |
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति के कवि सम्मेलनों से प्रभावित हो कर, कई अन्य समितियों ने भी कवि सम्मेलन करवाए, जिनमें सुरेन्द्र शर्मा, मानिक वर्मा, बाल कवि वैरागी इत्यादि आए | अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति से तीन संस्थाओं ने जन्म लिया --अखिल विश्व हिन्दी समिति, हिन्दी न्यास और हिन्दी यू. एस. ए. | अखिल विश्व हिन्दी समिति और हिन्दी न्यास तो अमरीका के कवियों के कवि सम्मलेन करवाते हैं और अखिल विश्व हिन्दी समिति कभी -कभी भारत से भी कवि बुला लेते हैं | हिन्दी यू. एस. ए. हर साल हिन्दी महोत्सव कार्यक्रम करते हैं, जिसमें वे भारत से कवि बुला कर कवि सम्मलेन करवाते हैं, पर यह कार्यक्रम मुख्य रूप से नई पीढ़ी का होता है | कवि सम्मेलनों का ही प्रभाव है कि १५०० बच्चों का कविता पाठ करवाया जाता है और सिर्फ ८० कवि बच्चे उनमें से चुने जाते हैं | हिन्दी महोत्सव से कई दिन पहले यह प्रतियोगिता शुरू हो जाती है | बच्चे जब कविता सुनाते हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि कवि सम्मेलनों का भविष्य अमेरिका में सुरक्षित है और कविता कहने की यह विधा और परम्परा युवा पीढ़ी में प्रचलित हो रही है | हिन्दी यू. एस. ए के ३० से ऊपर स्कूल हैं जिनमें हिन्दी पढ़ाई जाती है, ३००० से अधिक विद्यार्थी हिन्दी पढ़ते हैं, २५० अध्यापक और ७० स्वयं सेवी हैं |
अमरीका के हर शहर में प्रवासी भारतीय लघु भारत बसाए हुए हैं और विभिन्न भाषा- भाषी आपसी संवाद के रूप में हिन्दी का प्रयोग अधिक कर रहे हैं.. हिन्दी के इस निरन्तर बढ़ते प्रयोग के लिए हिन्दी सिनेमा और हिन्दी दूरदर्शन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सराहनीय है | विडिओ टैक्नालोजी और उपग्रह रेडिओ संचरण के माध्यम से हज़ारों मील दूर बसे प्रवासी भारतीयों के घरों में आज भारतीय सिनेमा, टेलिविज़न और रेडियो सहज ही पहुँच रहे हैं | इस कारण प्रवासी भारतीयों का अपने भारत से सम्बन्ध बराबर बना रहता है | वे सजीव समाचारों के माध्यम से वहाँ की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति से भी अवगत रहते हैं..अपनी भाषा को सीखने और सुरक्षित रखने की जागरूकता भी उनमें बढ़ गई है | हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या विश्वविद्यालयों में लगातार बढ़ती जा रही है और हिन्दी में मास्टर और पीएचडी करवाने की कोशिश जारी है |
अमेरिका के साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य को भी समृद्ध किया है | ३०० के क़रीब कविता -कहानी संग्रह और उपन्यास यहाँ के साहित्यकारों के आ चुके हैं | कई साहित्यकार साहित्य की मुख्य धारा का अंग बन चुके हैं |
अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से 'विश्वा', हिन्दी न्यास की तरफ़ से 'हिन्दी जगत', अखिल विश्व हिन्दी समिति की 'सौरभ' और हिन्दी यूएसए की 'कर्म भूमि' पत्रिकाएँ छपती हैं | अमरीका और कैनेडा के संयुक्त प्रयास से हिन्दी प्रचारिणी सभा की पत्रिका 'हिन्दी चेतना' पिछले १५ वर्षों से नियमित और निरन्तर छप रही है तथा स्तरीय पत्रिका के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर रही है | यह सर्कुलेशन में सबसे अधिक है |
हिन्दी को युवाओं की चेतना बनाने का संघर्ष अभी भी जारी है |



101 Guymon Ct.
Morrisville, NC-27560
USA
sudhadrishti@gmail.com


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Dec 04 2010

शाम ढले

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शाम ढले
प्रतीक्षा है
उस
पुरवाई की
जो
बहती आई थी
दूर दराज़ से कहीं |

लाई थी
खुशबुएँ
ढेरों फूलों की
महका गई थी
घर, आंगन, द्वार |

बही नहीं
कई दिनों से
दिशा दोष से घिर गई या
पथ परिवर्तन कर लिया |


प्रतीक्षा है
कब दोषमुक्त हो
बह निकले मेरे
गाँव की ओर
महका जाए
एक बार फिर
घर, आंगन, द्वार  |

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Nov 05 2010

अद्भुत कृति हूँ मैं

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कुम्हार की
अद्भुत कृति हूँ मैं,
उसी माटी से
उसने मुझे घड़ा है,
जिस माटी में एक दिन
सब को मिट जाना है |


नन्हें से दीप का आकार दे
आँच में तपा कर
तैयार किया है मुझे
अँधेरे को भगाने |


फिर छोड़ दिया
भरे पूरे संसार में
जलने औ' जग रौशन करने |


हूँ तो नन्हा दीया
हर दीपावली पर जलता हूँ |
निस्वार्थ, त्याग, बलिदान
का पाठ पढ़ाता हूँ |
संसार में रौशनी बांटता
मिट जाता हूँ |

सुबह
मेरे आकार को
धो- पौंछ कर
सम्भाल लिया जाता है,
अगले साल जलने के लिए |
शायद यही मेरी नियति है |

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Aug 25 2010

ग़ज़ल

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फलक पे झूम रही सांवली घटाएं हैं
लगी चमकने हृदय में भी क्षण प्रभाएं हैं

वो मुझ से मिलने था आया मगर ना मिल पाया
उसी के गम में उदासी भरी दिशाएं हैं

वो पास था ना जाना उसे, मगर अब वो
चला गया तो लहू रो रही वफाएं हैं


हैं बेवफाई के चर्चे तो उसके हर सूं अब
बुझे चिराग़ हैं, रोती हुई हवाएं हैं


वतन को छोड़ के बेटा हुआ है परदेशी
उदास मां है मगर लब पे बस दुआएं हैं


नसीब में है 'सुधा' पान कब यहाँ सब के
गरल को पी के भी जीने की बस सजाएँ हैं

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