Mar 21 2009
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
मुझे पाकिस्तान की मुख्तारां माई से ( जिनका गैंग रेप हुआ था )मिलने का अवसर मिला, अपने स्तम्भ के लिए उनका इंटरव्यू लिया था. उनसे बातचीत कर यह महसूस हुआ कि इस त्रासदी को उन्होंने अपनी कमज़ोरी नहीं ताकत बना लिया है. अपराधियों के विरुद्ध वे लड़ीं और केस जीतीं . अब अपने इलाके में उन्होंने लड़कियों का स्कूल खोला है जहाँ लड़कियां पढ़तीं हैं . बलात्कृत महिलाओं को मुख्तारां माई सहारा देतीं हैं , उनके केस लड़तीं हैं व उन्हें कमज़ोर नहीं होने देतीं . एक लड़की के साथ तो माँ- बाप की मर्ज़ी से रिश्तेज़ाद भाईओं ने रेप किया. रिपोर्ट की तो जिस शर्मिंदगी से उसे गुज़रना पड़ा किस्से ऐसे थे कि रौंगटे खड़े हो गए. सगे रिश्तों ने लूटा, पीटा और ज़लील कर घर से निकाल दिया. दैनिक जागरण में भी एक ख़बर पढ़ी कि माँ की मौत के बाद दो बहनों का पिता और चाचा ने बलात्कार किया. इन सभी से प्रेरित जो रचना उत्पन्न हुई वह प्रस्तुत है---
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
जब पूछा उनसे
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
रिश्ते तो
भले
चंगे
सुख देने वाले होतें हैं .
भराए गले
गालों तक
लुढ़क आए
आंसुओं को समेटते वें बोलीं--
रिश्तों ने
समाज सम्मुख
बलात्कार कर
नंगे बदन
गाँव में घुमाया था.
माँ ने टांगे पकड़
बच्चा गिरवाया था
दूसरे कबीले
के लड़के से प्यार कर
ब्याह जो बनाया था.
मिलीभगत थी
पुलिस की भी
डराया था
धमकाया था
माँ बाप को तंग करेंगें
षड्यंत्र रचाया था
अपराधियों के खिलाफ
रपट वापिस लेने का
दबाब डलवाया था.
डटी रहीं थीं वें
रिश्तों से मुंह मोड़
समाज और इसके
ठेकेदारों से लड़
स्वाभिमान बचाया था.
औरतों के
अधिकारों का तमाशा बना
पुरूष
उसे अपने
उस साम्राज्य में
ले जाना है चाहता
जो सदियों के प्रयत्नों से
औरत को कमज़ोर बना
उसने बनाया था.
परिवार से दुत्कारी
रिश्तों से नक्कारी
पीड़ित , प्रताड़ित
ये वीरांगनाएँ
एक दूजे का साथ देतीं
न्याय को पुकारतीं
अधिकारों को गुहारतीं
बार -बार बदन ढकतीं
जो पुरुषों के
अनर्गल ,
बेवजह प्रश्नों से
उधड़-उधड़ जाता है.
सिर पर आँचल ओढ़ती
सब की सब कह उठीं --
क्या अब भी पूछना है
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
सुधा ओम ढींगरा
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
जब पूछा उनसे
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
रिश्ते तो
भले
चंगे
सुख देने वाले होतें हैं .
भराए गले
गालों तक
लुढ़क आए
आंसुओं को समेटते वें बोलीं--
रिश्तों ने
समाज सम्मुख
बलात्कार कर
नंगे बदन
गाँव में घुमाया था.
माँ ने टांगे पकड़
बच्चा गिरवाया था
दूसरे कबीले
के लड़के से प्यार कर
ब्याह जो बनाया था.
मिलीभगत थी
पुलिस की भी
डराया था
धमकाया था
माँ बाप को तंग करेंगें
षड्यंत्र रचाया था
अपराधियों के खिलाफ
रपट वापिस लेने का
दबाब डलवाया था.
डटी रहीं थीं वें
रिश्तों से मुंह मोड़
समाज और इसके
ठेकेदारों से लड़
स्वाभिमान बचाया था.
औरतों के
अधिकारों का तमाशा बना
पुरूष
उसे अपने
उस साम्राज्य में
ले जाना है चाहता
जो सदियों के प्रयत्नों से
औरत को कमज़ोर बना
उसने बनाया था.
परिवार से दुत्कारी
रिश्तों से नक्कारी
पीड़ित , प्रताड़ित
ये वीरांगनाएँ
एक दूजे का साथ देतीं
न्याय को पुकारतीं
अधिकारों को गुहारतीं
बार -बार बदन ढकतीं
जो पुरुषों के
अनर्गल ,
बेवजह प्रश्नों से
उधड़-उधड़ जाता है.
सिर पर आँचल ओढ़ती
सब की सब कह उठीं --
क्या अब भी पूछना है
रिश्तों से बगावत क्यूँ ?
सुधा ओम ढींगरा