Dec 04 2010
शाम ढले
शाम ढले
प्रतीक्षा है
उस
पुरवाई की
जो
बहती आई थी
दूर दराज़ से कहीं |
लाई थी
खुशबुएँ
ढेरों फूलों की
महका गई थी
घर, आंगन, द्वार |
बही नहीं
कई दिनों से
दिशा दोष से घिर गई या
पथ परिवर्तन कर लिया |
प्रतीक्षा है
कब दोषमुक्त हो
बह निकले मेरे
गाँव की ओर
महका जाए
एक बार फिर
घर, आंगन, द्वार |